Monday, September 28, 2026
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Diwali : मिट्टी के दीए पर्यावरण के लिए सुरक्षित, पर आधुनिकता में हो रहे उपेक्षित

सुकमा। रोशनी का पर्व दीपावली जैसे-जैसे करीब आता जा रहा है, बाजारों में रौनक लौट आई है। हर ओर बिजली की झालरों की चमक है, लेकिन इसी जगमगाहट के बीच मिट्टी के दीयों की लौ धीरे-धीरे मंद पड़ती जा रही है। कभी दीपावली की पहचान रहे ये दीए अब आधुनिक रोशनी की दौड़ में पीछे छूटते जा रहे हैं।

कभी हर घर का आंगन मिट्टी के दीयों से सजा रहता था, घी या तेल से टिमटिमाती लौ सिर्फ घरों को ही नहीं, बल्कि कुम्हारों के जीवन को भी उजाला देती थी। लेकिन आज बिजली की झालरों ने उस सादगी और आत्मीयता की जगह ले ली है, जिससे कुम्हारों की मेहनत और पुश्तैनी कला पर असर पड़ा है।

कुम्हारों की बदलती दुनिया

सुकमा और आसपास के गांवों में अब भी कुछ कुम्हार परिवार मिट्टी के दीए बनाने की परंपरा को थामे हुए हैं। पहले दीपावली से महीना भर पहले तक उनके घरों में चाक घूमता था, महिलाएं दीए सुखातीं और बच्चे रंग भरते थे। लेकिन अब यह दृश्य धुंधला पड़ गया है।

स्थानीय कुम्हार शिवनाथ बताते हैं —

“पहले हर साल 20 हजार से ज्यादा दीए बिक जाते थे, अब मुश्किल से 4000-5000 ही बिकते हैं। झालरों ने हमारे दीयों की कीमत कम कर दी है। बारिश ने भी इस साल हमें बहुत परेशान किया।”

उनकी पत्नी सेमलदई भावुक होकर कहती हैं —

“दीयों से ही घर चलता है। जब दीए नहीं बिकते, तो लगता है जैसे उम्मीद ही बुझ गई हो। बच्चों का पालन-पोषण भी इन्हीं मिट्टी के दीयों से होता है।”

संस्कृति और पर्यावरण का संबंध

मिट्टी के दीए सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और आस्था के प्रतीक हैं। ये पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं, जबकि झालरें बिजली की खपत बढ़ाती हैं और प्लास्टिक प्रदूषण भी फैलाती हैं।

एक छोटा-सा दिया जब जलता है, तो वह केवल प्रकाश ही नहीं देता — वह उम्मीद, परिश्रम और सकारात्मकता का प्रतीक होता है। यही भारतीय संस्कृति का सार है, जो आधुनिकता की चमक में खोता जा रहा है।

दीपावली का सच्चा अर्थ

इस दीपावली आइए, हम अपने घरों के साथ उन कुम्हारों के घरों को भी रोशन करें जिनके हाथों ने मिट्टी को जीवन दिया है। जब आप एक मिट्टी का दिया जलाएं, तो याद रखिए —

वह सिर्फ रोशनी नहीं, किसी मेहनतकश की उम्मीद की लौ है।

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