नई दिल्ली : इस साल के नोबेल शांति पुरस्कार की विजेता बनीं वेनेजुएला की प्रमुख विपक्षी नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता मारिया कोरिना मचाडो (Maria Corina Machado)। नॉर्वे की नोबेल समिति ने उन्हें लोकतंत्र की रक्षा और तानाशाही के खिलाफ संघर्ष के लिए सम्मानित किया है। समिति ने कहा कि “मारिया कोरिना वेनेजुएला में लोकतंत्र की लौ को अंधेरे में जलाए रखने वाली महिला हैं।”
दूसरी ओर, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस बार शांति के नोबेल पुरस्कार की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। दिलचस्प बात यह है कि मारिया और ट्रंप – दोनों का दुश्मन एक ही है — वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो।
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मारिया कोरिना मचाडो पिछले कई वर्षों से मादुरो शासन के खिलाफ खुलकर आवाज उठा रही हैं। लोकतंत्र और मानवाधिकारों की वकालत करने के कारण उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं। बताया जाता है कि बीते 14 महीनों से वह सुरक्षा कारणों से छिपकर रह रही हैं। इस साल जनवरी में कराकस में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान मचाडो को पुलिस ने कुछ समय के लिए हिरासत में भी लिया था, हालांकि अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।
वेनेजुएला की “आयरन लेडी” के नाम से प्रसिद्ध मचाडो बीते दो दशकों से तानाशाही के खिलाफ शांति और लोकतंत्र की लड़ाई लड़ रही हैं। उनकी यह लड़ाई जनता के अधिकारों और पारदर्शी शासन की मांग पर आधारित है।
उधर, डोनाल्ड ट्रंप ने भी मादुरो शासन के खिलाफ सख्त रुख अपनाया था। उनके कार्यकाल के दौरान अमेरिकी प्रशासन ने मादुरो पर ड्रग तस्करी और आतंकवाद से संबंधों के आरोप लगाए थे। अमेरिकी न्याय विभाग ने 2020 में मादुरो के सिर पर इनाम की घोषणा की थी, जिसे 2025 में बढ़ाकर पांच करोड़ डॉलर कर दिया गया। ट्रंप प्रशासन मादुरो को “नार्कोटेरेरिस्ट” कहता रहा है और उसे सत्ता से हटाने के लिए सैन्य कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय दबाव की रणनीति अपनाई थी।
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नोबेल समिति के निर्णय से एक ओर जहां वेनेजुएला में लोकतंत्र समर्थकों के हौसले बुलंद हुए हैं, वहीं ट्रंप समर्थक इसे राजनीतिक झुकाव का परिणाम मान रहे हैं। फिर भी यह निर्विवाद है कि मारिया कोरिना मचाडो ने अपने साहस, नेतृत्व और अहिंसक संघर्ष से दुनिया को यह दिखाया है कि लोकतंत्र की ज्वाला किसी भी तानाशाही से बड़ी होती है।












