निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नकली नोट मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल नकली नोटों की बरामदगी से किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसकी जानकारी और आपराधिक मंशा साबित न हो।
क्या था मामला?
यह मामला जांजगीर-चांपा जिले के अकलतरा स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया शाखा से जुड़ा है। 22 दिसंबर 2005 को आरोपी रोहित कुमार पांडेय अपने पिता और चाचा के खातों में करीब 2 लाख रुपये जमा करने बैंक पहुंचे थे। गिनती के दौरान कैशियर को नोटों पर संदेह हुआ और जांच में 161 नोट नकली पाए गए।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा
मामले में पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर IPC की धारा 489-B और 489-C के तहत केस दर्ज किया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी मानते हुए 3 साल और 2 साल की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट में क्या हुई बहस
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि उसे नोटों के नकली होने की कोई जानकारी नहीं थी और वह सिर्फ पैसे जमा करने गया था। नोट उसे उसके चाचा ने दिए थे। साथ ही गवाहों के बयानों में विरोधाभास होने की बात भी सामने रखी गई।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि केवल नकली नोटों की बरामदगी से अपराध सिद्ध नहीं होता। यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी को नोटों के नकली होने की जानकारी थी और उसकी मंशा भी गलत थी। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका।
आरोपी को मिली राहत
कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी सिर्फ पैसे जमा करने का माध्यम था और उसके चाचा ने स्वयं पैसे देने की बात स्वीकार की थी। ऐसे में आरोपी की दोषपूर्ण मंशा साबित नहीं हो पाई।इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।











