दंतेवाड़ा। Maa Danteshwari Temple Traditions: दक्षिण छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की अधिष्ठात्री देवी मां दंतेश्वरी के दंतेवाड़ा स्थित ऐतिहासिक मंदिर में दीपावली पर्व पर निभाई जाने वाली सदियों पुरानी अनूठी परंपराएं और विशिष्ट पूजा-विधान एक बार फिर शुरू हो गए हैं। इस पावन अवसर पर मां दंतेश्वरी का जंगलों से एकत्र की गई 7 विशेष प्रकार की जड़ी-बूटियों (औषधियों) से तैयार काढ़े से भव्य ‘औषधि स्नान संस्कार’ कराया जाता है। इसके साथ ही, वर्षभर शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा के रूप में पूजी जाने वाली देवी दीपावली पर धन और समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी यानी नारायणी स्वरूप में दर्शन देती हैं।
मंदिर में इस विशेष अनुष्ठान को ‘तुलसी पानी विधान’ और ‘औषधि स्नान संस्कार’ के नाम से जाना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से त्रयोदशी तक चलने वाले इस विधान में तड़के करीब तीन बजे मंदिर के परंपरागत सेवादार माता सरोवर से कांवड़ में जल लाकर देवी के गर्भगृह में अर्पित करते हैं। दीपावली के दिन तड़के ब्रह्ममुहूर्त में औषधि स्नान के साथ इस धार्मिक प्रक्रिया का समापन होता है।

मशालों की रोशनी में जंगलों से औषधियां लाते हैं कतियार परिवार
इस परंपरा का सबसे अनूठा और रहस्यमय पहलू दीपावली की पूर्व संध्या पर शुरू होता है। माता के औषधि स्नान के लिए आवश्यक जड़ी-बूटियां जुटाने की जिम्मेदारी मंदिर के बारह लंकवार सेवादारों में शामिल ‘कतियार परिवार’ के पास पीढ़ियों से सुरक्षित है, जिसमें पंडाल और बोड़का परिवार के सदस्य भी सहयोग करते हैं। शाम की विशेष पूजा के बाद सेवादार मशालें लेकर घने जंगलों की ओर प्रस्थान करते हैं। जंगल से लाई जाने वाली औषधियों के नाम और उनकी पहचान को परंपरा के तहत पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है। इन जड़ी-बूटियों को मंदिर के भोग कक्ष में रातभर उबालकर उनका अर्क निकाला जाता है।
माता का नारायणी स्वरूप और गरुड़ स्तंभ की मान्यता
मंदिर के पुजारियों के अनुसार, मां दंतेश्वरी मूल रूप से नारायणी स्वरूप में विराजित हैं, जिसकी पुष्टि मंदिर के ठीक सामने स्थापित गरुड़ स्तंभ से भी होती है। इसी मान्यता के कारण दीपावली पर माता का महालक्ष्मी स्वरूप में विशेष श्रृंगार और पूजन होता है। इसके अलावा मंदिर परिसर में एक ही शिलाखंड पर उकेरी गई भैरव और गजलक्ष्मी की दुर्लभ संयुक्त प्रतिमा का भी इस अवसर पर विशेष पूजन किया जाता है।
स्थानीय समाजों का जुड़ाव और सांस्कृतिक धरोहर
इस अनुष्ठान में स्थानीय कुम्हार समाज द्वारा तैयार मिट्टी के पारंपरिक दीये, कलश और हांडी पहले गर्भगृह में अर्पित किए जाते हैं, जिसके बाद ही पूरे मंदिर परिसर में दीप प्रज्ज्वलन शुरू होता है। औषधि स्नान, विशेष श्रृंगार, छप्पन भोग और महाआरती के साथ यह दीपोत्सव संपन्न होता है। दंतेवाड़ा की यह परंपरा आदिवासी संस्कृति, वन औषधियों के ज्ञान और सामाजिक समरसता की अद्भुत मिसाल पेश करती है।
