नई दिल्ली : देश का डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इस सफलता के पीछे गंभीर वित्तीय दबाव और स्थिरता का संकट भी है। 1 फरवरी 2026 को पेश होने वाले बजट में वित्त मंत्रालय के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यूपीआई और डिजिटल पेमेंट्स को टिकाऊ कैसे बनाया जाए। रिकॉर्ड ट्रांजेक्शन के बावजूद पेमेंट एग्रीगेटर्स और बैंकों को नुकसान झेलना पड़ रहा है, जो डिजिटल इंडिया की यात्रा के लिए चिंता का विषय बन गया है।
यूपीआई ट्रेडर्स की विस्तार में थकान
10 रुपए की चाय से लेकर 50,000 रुपए के स्मार्टफोन तक, यूपीआई पेमेंट रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। लेकिन उद्योग विश्लेषकों का कहना है कि पिछले तीन वर्षों में सक्रिय व्यापारी क्यूआर नेटवर्क की वृद्धि केवल 5% रही। भारत के केवल 45% व्यापारी मासिक आधार पर यूपीआई स्वीकार करते हैं, जबकि तीसरे और चौथे स्तर के शहरों में यूपीआई की पैठ बेहद कम है।
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एमडीआर शून्य नीति से वित्तीय दबाव
केंद्र सरकार की शून्य एमडीआर पॉलिसी ने वित्तीय समावेशन बढ़ाया, लेकिन इसका बोझ अब बैंकों और फिनटेक कंपनियों पर भारी पड़ रहा है। आरबीआई के अनुसार, प्रत्येक लेनदेन प्रोसेस करने की लागत लगभग 2 रुपए है। PhonePe और अन्य फिनटेक फर्मों ने चेतावनी दी है कि मौजूदा प्रोत्साहन और सब्सिडी संरचना दीर्घकालीन संचालन के लिए पर्याप्त नहीं है।
सरकारी सब्सिडी में कमी और बढ़ते नुकसान
वित्त वर्ष 2023-24 में 3,900 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन पैकेज था, जो 2024-25 में घटकर 1,500 करोड़ और वर्तमान बजट में मात्र 427 करोड़ रुपये रह गया। इससे छोटे व्यापारी और फिनटेक कंपनियां बड़े निवेश और विस्तार योजनाओं के लिए दबाव में हैं।
बजट 2026 में समाधान की उम्मीद
उद्योग जगत के नेता बजट में एक नियंत्रित एमडीआर (MDR) या पर्याप्त सरकारी सब्सिडी की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस तरह का स्थायी राजस्व मॉडल लागू होने से यूपीआई इकोसिस्टम आत्मनिर्भर बनेगा और डिजिटल वित्तीय समावेशन को देशभर में बढ़ावा मिलेगा।
भविष्य की चुनौती
अगर बजट में पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए, तो फिनटेक कंपनियों को परिचालन कटौती, ग्रामीण विस्तार रोकने और नवाचार सीमित करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। इससे डिजिटल इंडिया की सबसे बड़ी उपलब्धियों में बाधा आएगी और लाखों छोटे व्यापारी और उपभोक्ता प्रभावित होंगे।











