Kharsia Custodial Death Update : खरसिया कस्टोडियल डेथ अपडेट: गरीब की जान का ‘सौदा’, हत्या के आरोप पर सिर्फ ‘लाइन अटैच’ का झुनझुना

VIKASH KHALKHO

Kharsia Custodial Death Update : गौरी शंकर गुप्ता/रायगढ़ (06 मार्च 2026): खरसिया के परसकोल निवासी रमेश चौहान की पुलिस हिरासत में हुई मौत का मामला अब प्रशासनिक और राजनीतिक ‘समझौते’ की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। बोतल्दा NH-49 पर हजारों ग्रामीणों के आक्रोश और घंटों चले चक्काजाम के बाद प्रशासन ने प्रदर्शन खत्म कराने के लिए जो रास्ता निकाला, उसे जानकार न्याय के बजाय महज एक ‘एंटी-क्लाइमेक्स’ मान रहे हैं। संगीन आरोपों के बावजूद दोषी पुलिसकर्मियों पर FIR दर्ज करने के बजाय उन्हें केवल ‘लाइन अटैच’ कर दिया गया है।

मेडिकल रिपोर्ट और ‘थर्ड डिग्री’ के आरोप रमेश चौहान की मेडिकल रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि उसकी मौत सिर की नस फटने यानी ‘ब्रेन हेमरेज’ के कारण हुई है। परिजनों और प्रत्यक्षदर्शियों का सीधा आरोप है कि पुलिस की बर्बर ‘थर्ड डिग्री’ पिटाई ने रमेश की जान ली। ग्रामीणों का सवाल है कि जब मौत की वजह स्पष्ट है, तो जिम्मेदार पुलिसकर्मियों पर हत्या की धारा के तहत कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या किसी की जान लेने का हर्जाना सिर्फ दफ्तर बदलना (लाइन अटैच) हो सकता है?

मुआवजे के नाम पर ‘कलेक्टर दर’ की नौकरी कस्टोडियल डेथ जैसे जघन्य मामले में पीड़ित परिवार ने 1 करोड़ रुपये के मुआवजे और कड़ी कार्रवाई की मांग की थी। इसके बदले प्रशासन ने परिवार के एक सदस्य को ‘कलेक्टर दर’ (दैनिक वेतन भोगी) पर नौकरी देने का आश्वासन दिया है। आलोचकों का कहना है कि एक निर्दोष की जान की कीमत क्या सिर्फ चंद हजार रुपयों की संविदा नौकरी है? क्या परिवार की आर्थिक लाचारी को ढाल बनाकर असली गुनहगारों को बचाने की कोशिश की जा रही है?

विधायक की मध्यस्थता और न्यायिक जांच का पेंच दोपहर से शाम तक चले तनाव के बीच खरसिया विधायक उमेश पटेल ने प्रशासन और ग्रामीणों के बीच मध्यस्थता की। घंटों चली बंद कमरा चर्चा के बाद चक्काजाम तो खुल गया, लेकिन जनता संतुष्ट नहीं है। प्रशासन ने ‘न्यायिक जांच’ का पुराना पैंतरा चलते हुए ग्रामीणों से 5 नाम मांगे हैं जो जांच का हिस्सा होंगे। हालांकि, इतिहास गवाह है कि ऐसी जांचें अक्सर सालों तक फाइलों में दबी रह जाती हैं और वक्त के साथ मामला ठंडा पड़ जाता है।

सिस्टम से चुभता सवाल NH-49 पर यातायात बहाल हो गया है और नारेबाजी थम गई है, लेकिन रायगढ़ की जनता के मन में यह सवाल गहरे तक बैठ गया है कि क्या न्याय का तराजू रसूख और गरीबी देखकर काम करता है? एक गरीब की ‘हत्या’ के आरोप को ‘लाइन अटैच’ और ‘कलेक्टर दर’ के समझौते में दफन कर देना लोकतंत्र की शुचिता पर बड़ा दाग है।

अपडेट के मुख्य बिंदु:

  • कार्रवाई: दो आरक्षक लाइन अटैच (FIR दर्ज नहीं)।

  • आश्वासन: पीड़ित परिवार को कलेक्टर दर पर दैनिक वेतन भोगी नौकरी।

  • जांच: मजिस्ट्रियल जांच का वादा और ग्रामीणों के 5 प्रतिनिधि शामिल करने की बात।

  • विरोध: NH-49 से चक्काजाम हटा, पर जनता में आक्रोश बरकरार।

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विकास कुमार खलखो एक डिजिटल पत्रकार, समाचार संपादक और SEO कंटेंट क्रिएटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में एक दशक से अधिक का अनुभव है। उन्होंने BJMC, Master of Journalism (MJ) और M.Phil. (मीडिया स्टडीज़) की डिग्री हासिल की है और दबंग दुनिया, हमर छत्तीसगढ़ योजना, हरिभूमि, सन स्टार डेली न्यूज़ और छत्तीसगढ़ की आवाज़ जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है। उन्हें हिंदी पत्रकारिता, ब्रेकिंग न्यूज़ कवरेज, SEO-फ्रेंडली कंटेंट राइटिंग, डिजिटल पब्लिशिंग, कंटेंट स्ट्रैटेजी, थंबनेल डिज़ाइन और सोशल मीडिया मैनेजमेंट में विशेष महारत हासिल है। उनका उद्देश्य सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों तक प्रभावशाली समाचार पहुँचाना और साथ ही उच्च गुणवत्ता वाला डिजिटल कंटेंट तैयार करना है।
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