HRW Report Bangladesh Hindus : अगले महीने 12 फरवरी 2026 को होने वाले आम चुनाव से पहले बांग्लादेश में सांप्रदायिक तनाव और कट्टरपंथ अपने चरम पर है। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2024 में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद से देश में हिंदू और अन्य जातीय अल्पसंख्यकों पर हमले तेजी से बढ़े हैं। मानवाधिकार समूहों ने अब तक हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की 51 से अधिक घटनाओं की पुष्टि की है, जिनमें कम से कम 10 लोगों की हत्या कर दी गई है। हाल ही में गाजीपुर में एक हिंदू दुकानदार की फावड़े से पीट-पीटकर की गई हत्या ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है।
रिपोर्ट में विशेष रूप से ‘जेंडर आधारित हिंसा’ (Gender-based Violence) में हुई बढ़ोतरी को रेखांकित किया गया है। आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 की तुलना में 2025 की पहली छमाही में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में भारी वृद्धि देखी गई है। बांग्लादेश महिला परिषद की अध्यक्ष डॉ. फौजिया मुस्लिम ने इसके लिए धार्मिक कट्टरपंथियों की बढ़ती सक्रियता को जिम्मेदार ठहराया है। कट्टरपंथी समूहों द्वारा महिलाओं की स्वतंत्रता और उनकी सार्वजनिक भागीदारी को ‘इस्लाम विरोधी’ बताकर दबाने की संगठित कोशिशें की जा रही हैं, जिससे महिलाओं में डर का माहौल है।
आगामी चुनावों में महिलाओं की भागीदारी के आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं। कुल 51 राजनीतिक दलों में से 30 दलों ने एक भी महिला उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा है। कट्टरपंथी दल जमात-ए-इस्लामी, जिसने 276 उम्मीदवार खड़े किए हैं, उनमें महिलाओं की संख्या शून्य है। कुल 2,568 उम्मीदवारों में से केवल 109 महिलाएं हैं, जो कुल का महज 4.24% है। यह उस देश के लिए चिंताजनक है जहाँ दशकों तक सत्ता की कमान महिलाओं के हाथ में रही है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि अल्पसंख्यकों पर हो रहे इन हमलों को अक्सर ‘व्यक्तिगत रंजिश’ या ‘राजनीतिक विवाद’ का नाम देकर दबाने की कोशिश की जाती है। राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप (RRAG) की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 45 दिनों में ही 15 हिंदुओं की हत्या की गई है। कई मामलों में हत्याएं बेहद बर्बर तरीके से की गई हैं, जिससे अल्पसंख्यक समुदाय में असुरक्षा की भावना गहरी हो गई है। कट्टरपंथियों द्वारा डिजिटल माध्यमों पर भी महिलाओं और उदारवादी आवाजों को निशाना बनाया जा रहा है।
HRW ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और चुनाव आयोग से आग्रह किया है कि वे लैंगिक समानता और अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधानों को सख्ती से लागू करें। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि हिंसा और भेदभाव का यह दौर जारी रहा, तो आगामी चुनाव न तो समावेशी होंगे और न ही निष्पक्ष। अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों और यूरोपीय संघ ने भी इन परिस्थितियों पर अपनी पैनी नजर बना रखी है।













