रायपुर : छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के खरोरा क्षेत्र में स्थित मोजो मशरूम फैक्ट्री से 109 बाल श्रमिकों के रेस्क्यू को 47 दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब तक एफआईआर दर्ज न होना प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।17 नवंबर को की गई कार्रवाई को सरकार की त्वरित प्रतिक्रिया के रूप में देखा गया था, लेकिन उसके बाद की सुस्त कानूनी प्रक्रिया ने पूरे मामले को प्रशासनिक समन्वय की कमजोरी का उदाहरण बना दिया है।
कार्रवाई हुई, पर कानूनी प्रक्रिया क्यों अटकी?
रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान 68 बच्चियों और 41 बच्चों को खतरनाक परिस्थितियों से बाहर निकाला गया। यह निस्संदेह एक सकारात्मक कदम था। हालांकि, इसके बाद जिस तेजी से बयान, प्राथमिकी और अभियोजन की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए थी, वह देखने को नहीं मिली।
पुलिस का कहना है कि रेस्क्यू में शामिल एनजीओ और अधिकारियों के बयान अब तक दर्ज नहीं हुए, जबकि एनजीओ दावा कर रहे हैं कि 17 दिसंबर को सभी दस्तावेज थाने में जमा कर दिए गए थे। यह विरोधाभास बताता है कि समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि समन्वय और जवाबदेही की है।
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सरकार की मंशा बनाम सिस्टम की सुस्ती
छत्तीसगढ़ सरकार के पास बाल संरक्षण से जुड़े स्पष्ट कानून, विभाग और संस्थागत ढांचा मौजूद है। ऐसे में मामला यह नहीं है कि सरकार कार्रवाई नहीं चाहती, बल्कि यह दिखता है कि मैदानी स्तर पर प्रक्रिया की गति सरकार की मंशा के अनुरूप नहीं चल पा रही।
एफआईआर में देरी न केवल जांच को कमजोर करती है, बल्कि इससे दोषियों को कानूनी लाभ मिलने की आशंका भी बढ़ जाती है। यह स्थिति बाल अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से बनाई गई नीतियों को व्यावहारिक चुनौती देती है।
बच्चों की आपबीती ने बढ़ाई गंभीरता
रेस्क्यू किए गए बच्चों द्वारा बताए गए हालात—
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एक कमरे में 10–15 बच्चों को रखना
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सुबह 4–5 बजे से देर रात तक काम
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सीमित भोजन
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फॉर्मोलीन जैसे जहरीले केमिकल के संपर्क में काम
इन तथ्यों ने मामले को सिर्फ श्रम कानून का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और मानवाधिकार संकट का विषय बना दिया है। ऐसे में केवल कागजी जांच पर्याप्त नहीं, बल्कि स्वतंत्र मेडिकल और पर्यावरणीय जांच की भी आवश्यकता है।
प्रशासन के लिए अग्निपरीक्षा
नगर पुलिस अधीक्षक वीरेंद्र चतुर्वेदी का कहना था कि दस्तावेजों की जांच के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। यह बयान प्रक्रिया के प्रति सावधानी तो दर्शाता है, लेकिन 47 दिन की देरी प्रशासन की तत्परता पर सवाल खड़े करती है।
सरकार के लिए यह मामला अब केवल एक फैक्ट्री तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सरकारी तंत्र की संवेदनशीलता और विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुका है।
मीडिया ने उठाया मुद्दा
इस पूरे मामले को सबसे पहले ‘निशानेबाज़’ न्यूज ने उजागर किया था। अब यह मामला सिर्फ बाल श्रमिक शोषण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता और जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल बन चुका है।
इरादे पर नहीं, अमल पर सवाल
यह मामला यह नहीं दर्शाता कि छत्तीसगढ़ सरकार बच्चों के प्रति असंवेदनशील है, बल्कि यह बताता है कि रेस्क्यू के बाद न्याय तक पहुंचने की प्रक्रिया में गंभीर शिथिलता है।
सरकार यदि समयबद्ध एफआईआर, स्पष्ट जिम्मेदारी तय करने और बच्चों के पुनर्वास की ठोस जानकारी सार्वजनिक करती है, तो न केवल भरोसा बहाल होगा, बल्कि यह संदेश भी जाएगा कि बाल श्रम के मामलों में राज्य जीरो टॉलरेंस की नीति पर अमल करता है।













