Rewa forests : सीधी–रीवा जंगलों में विकास का असली रूप: पेड़ और जलस्रोत हो रहे भारी दोहन

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Rewa forests : सीधी। केंद्र और राज्य सरकार जहाँ जल जीवन मिशन के माध्यम से हर घर नल का जल पहुंचाने का सपना दिखा रही हैं, वहीं रीवा–सीधी के बीच फैले जंगलों में इसी योजना की आड़ में बड़े पैमाने पर पर्यावरण का विनाश हो रहा है। करीब 1947 करोड़ की लागत से चल रही इस परियोजना को दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड (DBL) द्वारा संचालित किया जा रहा है, लेकिन स्थानीय जल स्रोतों, तालाबों और घने वनों की अनदेखी ने स्थिति को गंभीर बना दिया है।
वन विभाग के आदेशों से अलग जमीन पर हकीकत
वनमंडल कार्यालय के 30 नवंबर 2023 के आदेश के अनुसार ग्राम सारदा में टंकी और पाइपलाइन निर्माण के लिए 0.944 हेक्टेयर वन भूमि देने की स्वीकृति दी गई थी। इस क्षेत्र में केवल 32 सागौन पेड़ों के हटाने की अनुमति थी, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरणविदों का दावा है कि 2000 से ज्यादा पेड़ बेरहमी से काटकर सगमनिया तालाब और उसके आसपास के जंगलों को नष्ट कर दिया गया।
Rewa forests :
कागजों में 32 पेड़, जमीन पर हजारों पेड़ों की कटाई—यह बड़ा सवाल खड़ा करती है कि पर्यावरण मंजूरी के नाम पर क्या कुछ छिपाया जा रहा है?
सगमनिया तालाब और विंध्य वनक्षेत्र को भारी नुकसान
विंध्य क्षेत्र के पर्यावरणविदों ने बड़ा खुलासा किया है कि DBL ने ऐतिहासिक सगमनिया तालाब के आसपास के हजारों वर्ष पुराने जंगल को JCB मशीनों से समतल कर दिया।
तालाब की गहराई नष्ट होने से क्षेत्र में जलस्तर तेजी से गिर रहा है, जैव विविधता खत्म हो रही है और जंगली जानवर मानव बस्तियों की ओर बढ़ते जा रहे हैं।
यह केवल सीधी–रीवा क्षेत्र का मामला नहीं है। हैदराबाद दिशा के जंगलों में भी इसी तरह के निर्माण कार्य जारी हैं।
पर्यावरणविदों और समाजसेवियों का आक्रोश
पर्यावरण कार्यकर्ता नरेंद्र बरोलिया ने कहा—
“अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो जल–जंगल–जमीन का संतुलन स्थायी रूप से नष्ट हो जाएगा। विकास के नाम पर भविष्य की पीढ़ियों के हाथ बंजर जमीन और सूखे जलस्रोत ही लगेंगे।”
उन्होंने NGT और संबंधित विभागों की चुप्पी पर भी सवाल उठाया।
DBL पर गंभीर आरोप:
  • बिना अनुमति वन भूमि में JCB से पहाड़ तोड़े गए
  • पत्थरों को पीसकर बालू बनाया गया
  • बारिश में सारी मिट्टी और पत्थर तालाब में भर गए
  • तालाब की जल धारण क्षमता समाप्त हो गई
  • पेयजल स्रोत पूरी तरह नष्ट
नगर परिषद अध्यक्ष अभिषेक सिंह ने भी DBL पर आरोप लगाते हुए कहा कि कंपनी की लापरवाही से नगर पेयजल व्यवस्था बार-बार ठप हो जाती है।
सवालों के घेरे में अधिकारी
स्थानीय लोगों का कहना है—
“अगर वन विभाग ने अनुमति नहीं दी, तो कंपनी जंगल में मशीनें लेकर पहुँची कैसे?”
लोगों को संदेह है कि कुछ अधिकारी संरक्षण दे रहे हैं।
अब नजर प्रशासन के रुख पर
यह मामला केवल विकास बनाम पर्यावरण का नहीं, बल्कि नीति और वास्तविकता के टकराव का है।
क्या जंगलों को उजाड़कर जलसंकट दूर होगा या और बढ़ेगा?
क्या भ्रष्टाचार और लापरवाही पर कार्रवाई होगी या फाइलों में ही दब जाएगी?
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि अब समय आ गया है कि हर नागरिक इन सवालों को उठाए और प्रशासन यह सुनिश्चित करे कि विकास प्रकृति को नष्ट किए बिना हो।
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