पटना। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के प्रचार के दौरान जनता दल यूनाइटेड में बगावत खुलकर सामने आई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल 11 नेताओं को तत्काल प्रभाव से निष्कासित कर दिया। इन नेताओं में पूर्व मंत्री, पूर्व विधायक और अन्य प्रभावशाली चेहरे शामिल हैं। पार्टी का कहना है कि इन नेताओं ने बार-बार समझाने के बावजूद पार्टी लाइन का पालन नहीं किया और संगठन के अनुशासन को चुनौती दी।
जेडीयू में असंतोष के मुख्य कारणों में टिकट बंटवारे की नाराज़गी, स्थानीय स्तर पर गुटबाज़ी और एनडीए के भीतर सीट शेयरिंग से उत्पन्न समीकरण शामिल हैं। कई पुराने नेता उम्मीद कर रहे थे कि उनके क्षेत्र में उनकी पकड़ मजबूत होने के कारण उन्हें टिकट मिलेगा, लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ, तो उन्होंने पार्टी की नीति के खिलाफ जाने का निर्णय लिया।
निष्कासित नेताओं में चार पूर्व विधायक, एक पूर्व मंत्री और पार्टी के कई अन्य प्रभावशाली नेता शामिल हैं। बरबीघा से सुदर्शन कुमार, बड़हरिया, सिवान से श्याम बहादुर सिंह, बरहरा, भोजपुर से रणविजय सिंह, कदवा, कटिहार से आशा सुमन, वैशाली से डॉ. आसमा परवीन, मोतिहारी से दिव्यांशु भारद्वाज और अन्य नेताओं ने निर्दलीय मैदान में उतरने का निर्णय लिया है। कई नेताओं का अपने क्षेत्र में मजबूत व्यक्तिगत जनाधार है, जिससे मुकाबला कई सीटों पर त्रिकोणीय हो गया है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि निष्कासित नेताओं के निर्दलीय चुनाव लड़ने से जेडीयू के आधिकारिक उम्मीदवारों का वोट कट सकता है। यह स्थिति विपक्षी दलों के लिए लाभदायक साबित हो सकती है, खासकर आरजेडी और कांग्रेस को। कई सीटों पर पहले जहां एनडीए की जीत आसान लग रही थी, अब मुकाबला अधिक पेचीदा हो गया है।
नीतीश कुमार ने इस कदम के जरिए साफ संदेश दिया है कि संगठन पर उनकी पकड़ ढीली नहीं होगी और पार्टी में अनुशासन सर्वोपरि है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि टिकट न मिलने पर बगावत बर्दाश्त नहीं की जाएगी और NDA के भीतर शक्ति संतुलन बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है।
विश्लेषकों का कहना है कि जेडीयू आने वाले समय में नए चेहरों और युवा नेताओं को आगे बढ़ाकर पार्टी का पुनर्गठन करना चाहती है। निष्कासित नेताओं के लिए चुनाव जीतना आसान नहीं होगा, चाहे उनके व्यक्तिगत जनाधार कितने भी मजबूत क्यों न हों। आगामी चुनाव में इस स्थिति से कई सीटों पर समीकरण बदल सकते हैं।











