रायगढ़। रायगढ़ लोकसभा की राजनीति इन दिनों एक गंभीर और चौंकाने वाली तस्वीर पेश कर रही है। पूर्व सांसद विष्णुदेव साय और गोमती साय को उनके कार्यकाल के दौरान सरकारी बंगले की सुविधा मिली थी, लेकिन मौजूदा आदिवासी सांसद राधेश्याम राठिया को चुने जाने के एक वर्ष बाद भी यह सुविधा नहीं मिली।
परंपरा और सम्मान में अंतर
- रायगढ़ लोकसभा में यह परंपरा रही है कि सांसदों को कार्यकाल के दौरान सरकारी बंगला आवंटित किया जाता रहा है।
- विष्णुदेव साय और गोमती साय को बंगले की सुविधा मिली, लेकिन राठिया इस सुविधा से वंचित रह गए।
- यह सिर्फ़ सुविधा का अभाव नहीं, बल्कि आदिवासी सांसद के सम्मान और गरिमा से जुड़ा गंभीर मामला है।
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सोशल मीडिया और प्रतिक्रियाएं
पूर्व युवा नेता और भाजयुमो के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष रवि भगत ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी और सवाल उठाया कि क्या आदिवासी सांसद को बंगला पाने के लिए अधिकारियों की चौखट पर नाक रगड़नी पड़ेगी। उनके अनुसार, यदि संवैधानिक पद पर बैठे प्रतिनिधि को ठिकाना नहीं मिलता, तो यह पूरे सिस्टम की विफलता को दर्शाता है।
जनता की चिंता
रायगढ़ की जनता सवाल कर रही है:
- “जब पूर्व सांसदों को बंगला मिला, तो मौजूदा सांसद को क्यों नहीं?”
- “पहले जनता सीधे सांसद निवास जाकर अपनी समस्या रख देती थी, अब सांसद का कोई स्थायी पता ही नहीं।”
- “क्या आदिवासी सांसद केवल वोट बैंक तक सीमित हैं?”
यह स्थिति सांसद और जनता के बीच सीधे संवाद को बाधित कर रही है। अब जनप्रतिनिधि से मिलने के लिए लोगों को गाँव–गाँव और गली–गली भटकना पड़ रहा है।
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व्यंग्य और आलोचना
- “पूर्व सांसदों को बंगले का सुख, मौजूदा सांसद को धूल और धक्के।”
- “बीजेपी के मंच पर आदिवासी गौरव का नारा, व्यवहार में आदिवासी सांसद बेघर।”
- “जहाँ नेता–अफसरों के पास आलीशान आवास हों, वहां सांसद का बेघर रहना लोकतंत्र पर सवाल है।”
सिस्टम पर गंभीर सवाल
- यह विवाद केवल बंगले तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासन की प्राथमिकताओं, राजनीतिक संवेदनशीलता और आदिवासी समाज के प्रतिनिधित्व से जुड़ा है।
- यदि रायगढ़ जैसे बड़े संसदीय क्षेत्र का सांसद आवास सुविधा से वंचित है, तो आम जनता के हालात का अनुमान लगाना कठिन नहीं।
- यह स्थिति भाजपा के आदिवासी प्रेम की वास्तविकता को उजागर करती है – मंच पर आदिवासी समाज का सम्मान, व्यवहार में उनके प्रतिनिधि की उपेक्षा।
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पूर्व सांसदों को बंगला मिला, लेकिन आदिवासी सांसद राधेश्याम राठिया को ठिकाना नहीं मिला। यह केवल व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी समाज के सम्मान से जुड़ा मुद्दा है। यदि जनप्रतिनिधि को ही “बेघर सांसद” बना दिया जाए, तो लोकतंत्र की नींव पर सवाल उठना स्वाभाविक है।











