Tuesday, September 22, 2026
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ग्वालियर का अजब-गजब स्कूल : मां-बाप की निगरानी में चल रही पढ़ाई, जर्जर स्कूल में हर पल डर का साया

भूपेन्द्र भदौरिया/ ग्वालियर – मध्यप्रदेश के ग्वालियर जिले में स्थित एक सरकारी प्राथमिक स्कूल की हालत ऐसी है कि वहां बच्चों से ज्यादा उनके माता-पिता डरे हुए हैं। मुरार डबका ग्राम पंचायत के गांव बंजारे का पूरा स्थित यह स्कूल अब किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। जर्जर हो चुकी इस स्कूल की बिल्डिंग में बच्चे तो पढ़ते हैं, लेकिन उनके साथ उनके माता-पिता भी स्कूल में डटे रहते हैं – ताकि किसी भी हादसे की स्थिति में बच्चों को बचाया जा सके।

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सुबह 9 बजे से दोपहर 2 बजे तक स्कूल में पहरा देते हैं पालक
स्कूल की हालत इतनी खराब है कि क्लासरूम की छत से लगातार पानी टपकता है, प्लास्टर झड़कर बच्चों के सिर पर गिरता है, दीवारें दरक चुकी हैं और बारिश में स्कूल परिसर तालाब बन जाता है। इन खतरनाक हालातों के बीच बच्चों को पढ़ाना मजबूरी बन गई है।

करीब 40 छात्र-छात्राएं इस स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन छत से गिरते मलबे और पानी के चलते अब क्लासरूम की जगह स्कूल के बाहर चबूतरे पर पढ़ाई करवाई जा रही है। स्कूल के शिक्षक और पालक खुद बच्चों की सुरक्षा में तैनात हैं।

शिक्षकों ने की शिकायतें, लेकिन कोई सुनवाई नहीं
स्कूल के शिक्षकों ने कई बार जिला शिक्षा अधिकारी को पत्र लिखकर स्कूल की खस्ताहाल स्थिति से अवगत कराया, लेकिन आज तक किसी ने सुध नहीं ली। स्थानीय जनप्रतिनिधियों से भी गुहार लगाई गई, लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया।

पालकों की चिंता: कहीं हादसा न हो जाए
एक पालक ने कहा – “राजस्थान के झालावाड़ में जर्जर स्कूल गिरने से जो हादसा हुआ, शायद ग्वालियर का प्रशासन भी किसी ऐसे ही हादसे का इंतजार कर रहा है।”

डरे हुए हैं बच्चे, कुछ ने स्कूल आना बंद किया
कई पालकों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया है। बच्चे खुद भी स्कूल की बिल्डिंग में घुसने से डरते हैं। लगातार गिरते प्लास्टर और रिसते पानी ने उनके मन में भय बैठा दिया है।

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जिस तरह की लापरवाही जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की तरफ से बरती जा रही है, वह न सिर्फ चिंताजनक है, बल्कि बच्चों की जान के साथ खुला खिलवाड़ है। अगर जल्द ही स्कूल भवन की मरम्मत या पुनर्निर्माण नहीं किया गया, तो यहां कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।

स्कूल शिक्षक: “हमने कई बार प्रशासन को बताया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। बच्चों की सुरक्षा के लिए अब पालक भी साथ में बैठते हैं।”
पालक: “हम अपने बच्चों को डर के साए में स्कूल भेजते हैं। पढ़ाई जरूरी है, लेकिन जान उससे भी ज्यादा कीमती है।”

सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति और प्रशासन की उदासीनता इस घटना के ज़रिए साफ झलकती है। यह मामला जिम्मेदार अधिकारियों की आँखें खोलने वाला बन सकता है – बशर्ते वे देखना चाहें।

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