Wednesday, September 23, 2026
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छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में फर्जी नामांकन का बड़ा खुलासा! 10 लाख छात्र रिकॉर्ड से बाहर

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निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में फर्जी और डुप्लीकेट नामांकन का बड़ा मामला सामने आया है। राज्य में यूडाइस (UDISE) सिस्टम के तहत विद्यार्थियों के नाम और आधार नंबर की अनिवार्य एंट्री के बाद सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2024 से 2026 के बीच पहली से 10वीं कक्षा तक के करीब 10 लाख नामांकन रिकॉर्ड से कम हो गए हैं।

डिजिटल सत्यापन के बाद सामने आए इस आंकड़े ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और वर्षों से चल रहे रिकॉर्ड पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आधार लिंकिंग से सामने आई वास्तविक संख्या

शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में सरकारी स्कूलों में 53.69 लाख विद्यार्थियों को मुफ्त किताबें वितरित की गई थीं। लेकिन 2026 में आधार सत्यापन और UDISE डेटा अपडेट के बाद यह संख्या घटकर करीब 43 लाख रह गई है।

इसका सीधा मतलब है कि लाखों छात्रों के नाम रिकॉर्ड में दर्ज थे, लेकिन उनकी वास्तविक मौजूदगी संदिग्ध थी। विशेषज्ञ इसे “घोस्ट स्टूडेंट्स” यानी कागजों पर मौजूद छात्रों का मामला मान रहे हैं।
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किताब छपाई में करोड़ों के खर्च पर सवाल

छात्रों की संख्या में अचानक आई इस गिरावट ने मुफ्त किताबों की छपाई और वितरण प्रक्रिया को लेकर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 से 2024 के बीच हर साल 51 से 53 लाख विद्यार्थियों के लिए किताबें छापी जाती रहीं।

अगर वर्तमान में सामने आई वास्तविक संख्या यानी लगभग 45 लाख छात्रों को आधार माना जाए, तो पिछले चार वर्षों में करीब 25 लाख अतिरिक्त विद्यार्थियों के नाम पर किताबें छापी गईं।

62 करोड़ रुपये के अतिरिक्त खर्च की आशंका

प्रति छात्र औसतन 250 रुपये की लागत के हिसाब से देखें तो अतिरिक्त किताब छपाई पर लगभग 62.50 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इससे किताब वितरण, रिकॉर्ड प्रबंधन और विभागीय मॉनिटरिंग पर सवाल उठने लगे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल सत्यापन से अब वास्तविक आंकड़े सामने आने लगे हैं, जिससे शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय से चल रही गड़बड़ियां उजागर हो रही हैं।

शिक्षा विभाग पर बढ़ा दबाव

मामला सामने आने के बाद शिक्षा विभाग पर जवाबदेही का दबाव बढ़ गया है। अब यह जांच का विषय बन गया है कि आखिर इतने वर्षों तक फर्जी और डुप्लीकेट नामांकन कैसे जारी रहे और किताबों के वितरण में निगरानी क्यों नहीं की गई।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, आने वाले समय में स्कूल स्तर पर रिकॉर्ड की और सख्ती से जांच की जाएगी ताकि भविष्य में ऐसी गड़बड़ियों को रोका जा सके।

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