Tuesday, September 15, 2026
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विदिशा में ‘नहर चोरी’ का खुलासा! सिंचाई जमीन पर खड़ी हो गई कॉलोनियां…

निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : मध्य प्रदेश के विदिशा जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सरकारी व्यवस्थाओं और जमीन संरक्षण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। किसानों की सिंचाई के लिए दशकों पहले बनाई गई नहर अब जमीन से गायब हो चुकी है। जहां कभी खेतों तक पानी पहुंचता था, वहां अब कंक्रीट की इमारतें और कॉलोनियां खड़ी नजर आ रही हैं। इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक माहौल भी गरमा गया है।

किसानों के लिए बनाई गई थी सिंचाई योजना

जानकारी के अनुसार विदिशा जिले के दौलतपुरा और मदनखेड़ा क्षेत्र में वर्षों पहले ‘उद्वहन सिंचाई योजना’ के तहत नहर बनाई गई थी। इस परियोजना का उद्देश्य किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाना और खेती को मजबूत करना था।

लेकिन समय के साथ नहर की जमीन पर कथित रूप से भू-माफियाओं ने कब्जा करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे वहां पक्के निर्माण और कॉलोनियां विकसित हो गईं। अब हालात यह हैं कि नहर का अधिकांश हिस्सा जमीन पर दिखाई ही नहीं देता।
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सिर्फ रिकॉर्ड में बची नहर

स्थानीय लोगों का कहना है कि आज नहर के नाम पर सिर्फ कुछ जर्जर संरचनाएं बची हैं। पानी सप्लाई करने वाली मशीनें या तो खराब हो चुकी हैं या गायब हो गई हैं। करोड़ों रुपये की सरकारी योजना अब केवल दस्तावेजों और फाइलों तक सीमित दिखाई दे रही है।

इस मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब विपक्ष ने इसे किसानों से जुड़े बड़े मुद्दे के रूप में उठाया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि किसानों की बात करने वाली सरकार अपने ही क्षेत्र में सिंचाई परियोजनाओं को बचाने में असफल रही है।

प्रशासन ने शुरू की कार्रवाई

मामला सामने आने के बाद राजस्व विभाग और प्रशासन हरकत में आया है। अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि मामला 40 से 50 साल पुराना है और पुराने रिकॉर्ड खंगालने में समय लग रहा है।

अब तक 11 लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं, जिन पर नहर की जमीन पर कब्जा करने का आरोप है। प्रशासन का कहना है कि दस्तावेजों की जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

किसानों में नाराजगी

इस खुलासे के बाद किसानों और स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ गई है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर नहर सही स्थिति में होती तो इलाके की खेती को बड़ा फायदा मिलता। अब लोग अतिक्रमण हटाने और सरकारी जमीन को मुक्त कराने की मांग कर रहे हैं।

यह मामला केवल अवैध कब्जे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारी योजनाओं की निगरानी और संरक्षण पर भी बड़ा सवाल बनकर सामने आया है।

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