निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच इस्लामाबाद में अहम वार्ता आयोजित की गई है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मुलाकात के साथ यह बैठक वैश्विक कूटनीति का केंद्र बन गई है। इस वार्ता का मुख्य उद्देश्य सीजफायर और क्षेत्रीय तनाव को कम करना है।
बातचीत से पहले ही मतभेद
हालांकि बातचीत शुरू होने से पहले ही दोनों पक्षों के बीच मतभेद साफ नजर आ रहे हैं। ईरान की ओर से संसद स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ नेतृत्व कर रहे हैं, जबकि अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ईरान के जमे हुए फंड को रिलीज नहीं करेगा।
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भरोसे की कमी बनी सबसे बड़ी बाधा
विश्लेषण के अनुसार, इस वार्ता की सबसे बड़ी चुनौती दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ कहा है कि उन्हें अमेरिका पर बिल्कुल भरोसा नहीं है, क्योंकि वह पहले भी कई बार अपने वादों से पीछे हट चुका है।
होर्मुज संकट और तेल बाजार पर असर
इस बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव का असर वैश्विक तेल बाजार पर भी दिख रहा है। 60 से अधिक बड़े तेल टैंकर अमेरिका के गल्फ कोस्ट की ओर बढ़ रहे हैं, जो वहां से कच्चा तेल लोड करेंगे। इससे साफ है कि दुनिया ऊर्जा आपूर्ति को लेकर सतर्क हो चुकी है।
ईरान की शर्तें और अमेरिका का रुख
ईरान ने बातचीत के लिए दो प्रमुख शर्तें रखी हैं—लेबनान में संघर्ष रोकना और उसके फंसे हुए अरबों डॉलर के फंड को जारी करना। लेकिन अमेरिका ने पहले ही इन शर्तों को मानने से इनकार कर दिया है, जिससे समाधान की राह और कठिन हो गई है।
गालिबाफ का भावनात्मक संकेत
ईरानी प्रतिनिधि गालिबाफ ने इस्लामाबाद पहुंचने पर एक भावनात्मक संदेश दिया, जिसमें उन्होंने युद्ध में मारे गए बच्चों की तस्वीरें साझा कीं। यह कदम अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान युद्ध के मानवीय पहलुओं की ओर खींचने का प्रयास माना जा रहा है।
क्या निकलेगा कोई समाधान?
फिलहाल यह वार्ता किसी स्पष्ट दिशा में जाती नहीं दिख रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों पक्ष अपने रुख में नरमी नहीं लाते, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। ऐसे में दुनिया की नजरें इस बातचीत के नतीजों पर टिकी हुई हैं।











