नई दिल्ली। Nishaanebaz.com-Meta Data Privacy Case: सोशल मीडिया क्षेत्र की प्रमुख दिग्गज कंपनी मेटा को डेटा प्राइवेसी से जुड़े एक बेहद गंभीर मामले में बहुत बड़ा कानूनी झटका लगा है। अमेरिका के न्यू मैक्सिको राज्य की एक अदालत ने कंपनी के डेटा कलेक्शन और यूज़र्स की जानकारी की सुरक्षा से जुड़े दावों में खामी पाते हुए 25 अरब डॉलर, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 2.3 लाख करोड़ रुपये बैठते हैं, का नागरिक जुर्माना ठोक दिया है। इस न्यायिक आदेश के बाद से ही वैश्विक टेक जगत और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स के बीच खलबली मच गई है, जबकि कंपनी ने फैसले का विरोध करते हुए इसे ऊपरी अदालत में चुनौती देने की बात कही है।
अदालत की सुनवाई और प्रस्तुत साक्ष्यों के विश्लेषण के आधार पर यह बात सामने आई है कि सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की कार्यप्रणाली ने न्यू मैक्सिको के उपभोक्ता संरक्षण कानून के कड़े प्रावधानों का स्पष्ट रूप से उल्लंघन किया था। मामले की विवेचना में आरोप लगाया गया कि कंपनी ने आम यूज़र्स को अपने डेटा एकत्र करने के तौर-तरीकों, उनकी प्राइवेसी नीतियों और हानिकारक कंटेंट से सुरक्षा प्रदान करने के झूठे या भ्रामक दावों के सहारे गुमराह किया था। अदालत का यह कड़ा रुख उस फैसले के आधार पर आया है जिसमें कंपनी को अनुचित व्यापार व्यवहार से जुड़े लाखों उल्लंघनों के लिए कसूरवार पाया गया था।
शुरुआती कानूनी बहसों और अदालती दस्तावेजों में हालांकि संभावित दंडात्मक राशि को बेहद विशाल स्तर यानी 219.5 अरब डॉलर तक आंकने का अनुमान लगाया गया था। इसके बावजूद, अंतिम समीक्षा और अंतिम अदालती आदेश पारित करते वक्त न्यायाधीश फ्रांसिस मैथ्यू ने इस वित्तीय पेनल्टी को घटाकर 25 अरब डॉलर तय किया। कोर्ट ने अपने स्पष्ट अभिमत में उल्लेख किया कि कंपनी के शीर्ष स्तर के प्रबंधन की भूमिका, उनकी नीतियों और राज्य के आम नागरिकों के व्यक्तिगत जीवन पर पड़े इसके सीधे प्रभाव को ध्यान में रखते हुए इतना सख्त कदम उठाना बेहद आवश्यक हो गया था।
न्यायिक आदेश में वित्तीय दंड के साथ-साथ एक बेहद सख्त वित्तीय शर्त भी शामिल की गई है, जिसके अनुसार जब तक पूरी दंड राशि का आधिकारिक भुगतान जमा नहीं हो जाता, तब तक उस पर प्रति वर्ष 15 प्रतिशत की दर से ब्याज जुड़ता रहेगा। न्यू मैक्सिको के अटॉर्नी जनरल राउल टोरेज़ ने इस फैसले का खुलकर स्वागत किया है और इसे आम नागरिकों के अधिकारों की जीत बताया है। उन्होंने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि प्रौद्योगिकी की दिग्गज कंपनियों को भी स्थापित कानूनों का अक्षरशः पालन करना ही होगा और उल्लंघन की स्थिति में गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
दूसरी तरफ, कंपनी के शीर्ष विधिक दल ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है और अपनी अगली कानूनी रणनीति का खुलासा किया है। मेटा के मुख्य कानूनी अधिकारी सी. जे. महोनी ने फैसले की तीखी आलोचना करते हुए यह भरोसा जताया कि अपीलीय प्रक्रिया के दौरान उन्हें कानून से राहत मिलेगी। कंपनी ने अपने पक्ष में तर्क दिया कि इस प्रकार के अप्रत्याशित फैसले राज्य के भीतर व्यापार और डिजिटल निवेश के माहौल को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कंपनी ने इस पूरे मामले को इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बुनियादी सिद्धांतों से भी जोड़कर देखा है।
इस पूरे विवाद की जड़ें और कानूनी पृष्ठभूमि साल 2018 के बहुचर्चित कैंब्रिज एनालिटिका प्रकरण से जुड़ी मानी जा रही हैं। उस समय यह बात सार्वजनिक हुई थी कि राजनीतिक विश्लेषक संस्था कैंब्रिज एनालिटिका ने करोड़ों फेसबुक यूज़र्स का निजी डेटा उनकी स्पष्ट सहमति या अनुमति के बिना हासिल कर लिया था। उस वैश्विक खुलासे के बाद से ही टेक प्लेटफॉर्म्स के डेटा प्राइवेसी तंत्र और यूज़र्स की निजी जानकारी सुरक्षित रखने के दावों पर लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर सवाल खड़े होते रहे हैं और अदालत में भी इन्हीं दावों की सत्यता को परखा गया था।
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इस ऐतिहासिक अदालती आदेश ने एक बार फिर से बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों की जवाबदेही, उनकी व्यावसायिक पारदर्शिता और इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले करोड़ों आम यूज़र्स के निजी डेटा की पुख्ता सुरक्षा जैसे बुनियादी सवालों को बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। यद्यपि कंपनी अब इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील दायर करने की तैयारी कर रही है, जिससे यह कानूनी खींचतान लंबे समय तक जारी रहने के आसार हैं, लेकिन इस तरह की दंडात्मक कार्रवाई से आने वाले समय में टेक कंपनियों की डेटा नीतियों में बड़े बदलावों की संभावना जताई जा रही है।