Gare Pelma Mine : गौरी शंकर गुप्ता/रायगढ़/तमनार। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनार स्थित गारे पेलमा सेक्टर-1 खदान क्षेत्र में हाल ही में संपन्न हुई जनसुनवाई ने लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ दी है। प्रशासन ने एक ऐसा ‘परिष्कृत’ प्रयोग कर दिखाया है, जहाँ ‘जनसुनवाई’ की औपचारिकता तो पूरी की गई, लेकिन उसमें उस ‘जनता’ का ही प्रवेश वर्जित रहा, जिसके भविष्य का फैसला होना था। 8 दिसंबर को तमनार में हुआ यह घटनाक्रम अब चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसे स्थानीय लोग ‘अदृश्य महोत्सव’ की संज्ञा दे रहे हैं।
Gare Pelma Mine : बीते दिनों जब 14 ग्रामों के हजारों निवासी अपनी जमीन और आजीविका की रक्षा के लिए जनसुनवाई स्थल पर पहुंचे, तो उन्हें भारी पुलिस सुरक्षा के साये में प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया गया। प्रशासन की इस ‘दूरदर्शिता’ का परिणाम यह रहा कि भीतर केवल कंपनी के प्रतिनिधि और फाइलों की पावन उपस्थिति रही। बाहर जनता अपनी आवाज उठाने के लिए संघर्ष करती रही और भीतर ‘शांतिपूर्ण’ ढंग से वह अनुष्ठान संपन्न हो गया, जिसे सरकारी दस्तावेजों में ‘जनसुनवाई’ कहा जाता है।
Gare Pelma Mine : इस प्रशासनिक रवैये के विरोध में पिछले 8 दिनों से 14 ग्रामों के आदिवासी कड़ाके की ठंड के बीच सड़कों पर ‘आर्थिक नाकेबंदी’ कर रहे हैं। कोयले के पहिए थमे हुए हैं और व्यापारिक गतिविधियां अवरुद्ध हैं, लेकिन प्रशासन का मौन टूटने का नाम नहीं ले रहा। आंदोलनकारियों का कहना है कि प्रशासन ने मान लिया है कि कड़ाके की शीत लहर में जलती मशालें और उनके नारे किसी प्रतिरोध का स्वर नहीं, बल्कि विकास की नई गाथा का हिस्सा हैं।
Gare Pelma Mine : तमनार की धूल भरी गलियों में अब यह सवाल तैर रहा है कि क्या विकास वह है जो जनता की जानकारी और सहमति के बिना उनके ही विरुद्ध कर दिया जाए? कागजों पर खदान की नींव रखी जा चुकी है और अब केवल उस भूमि का अधिग्रहण शेष है, जहाँ पीढ़ियों से आदिवासी निवास कर रहे हैं। प्रशासन ने कागजों पर ‘मैच’ तो जीत लिया है, क्योंकि नियम और रेफरी दोनों ही व्यवस्था के अनुकूल थे।
Gare Pelma Mine : वर्तमान में तमनार का यह संघर्ष ‘फर्जी फाइलों’ और ‘असली इंसानों’ के बीच के युद्ध में तब्दील हो गया है। देखना यह होगा कि 14 गांवों का यह जन-सैलाब व्यवस्था के इस काल्पनिक महल को कब तक अपनी नाकेबंदी से चुनौती देता रहता है और लोकतंत्र का ‘मौन व्रत’ कब टूटता है।













