निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में संचालित परसा ईस्ट केते बासेन और परसा कोल ब्लॉक को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड और अडानी माइनिंग कंपनी द्वारा क्षेत्र के विकास के जो दावे किए गए थे, वे अब सवालों के घेरे में हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि विकास कार्य केवल कागजों तक सीमित हैं, जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव
खनन से प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाओं की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अब तक स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर कोई ठोस पहल नहीं की गई है, जिससे ग्रामीणों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
रोजगार और स्वरोजगार योजनाएं ठप
कंपनी द्वारा रोजगार और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई योजनाएं शुरू करने का दावा किया गया था। लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश योजनाएं सिर्फ कागजों में ही संचालित हो रही हैं। जिन कुटीर और लघु उद्योगों की बात की गई थी, वहां केवल बोर्ड और बंद दफ्तर ही नजर आते हैं।
शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि क्षेत्र में संचालित स्कूलों में आम लोगों के बच्चों की भागीदारी बहुत कम है, जबकि वहां कंपनी से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के बच्चे पढ़ते नजर आते हैं।
सरपंचों और जनप्रतिनिधियों की मांग
कई ग्राम पंचायतों के सरपंच और जनप्रतिनिधियों ने कलेक्टर से मुलाकात कर मांग की है कि एक खंड स्तरीय निगरानी समिति गठित की जाए। यह समिति कंपनी द्वारा किए जा रहे विकास कार्यों की निगरानी करे और लापरवाही पाए जाने पर कार्रवाई सुनिश्चित करे।
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प्रशासन से कार्रवाई की उम्मीद
जिला पंचायत सदस्य और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि अगर कंपनी अपने वादों को पूरा नहीं करती है, तो प्रशासन को सख्त कदम उठाने चाहिए। उनका मानना है कि खनन परियोजना शुरू होने के बाद से कई गांव प्रभावित हुए हैं, लेकिन लोगों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा है।
लंबे समय से चल रहा विरोध
स्थानीय स्तर पर कोयला खनन को लेकर पहले से ही विरोध होता रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि कंपनी द्वारा किए गए वादे अधूरे रह गए हैं और केवल दिखावे के लिए योजनाओं का प्रचार किया जा रहा है। ऐसे में अब लोगों ने प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग तेज कर दी है।











