Saturday, August 15, 2026
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Singrauli News : आदिवासी पंचायत में राशन घोटाला? परासी गांव के लोगों को तीन महीने से नहीं मिला अनाज, भूख के साए में जी रहे हैं दर्जनों परिवार

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सिंगरौली। 21वीं सदी के भारत में “सबको अन्न, सबको अधिकार” जैसे वादों के बीच मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले से एक गंभीर और शर्मनाक खबर सामने आई है। सरई तहसील के गडईगांव पंचायत अंतर्गत परासी गांव में आदिवासी परिवार पिछले तीन महीनों से राशन से वंचित हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (NFSA) के तहत मिलने वाला मुफ्त अनाज इन जरूरतमंद परिवारों तक नहीं पहुंच पाया, जबकि फिंगरप्रिंट लेकर वितरण की पुष्टि कर दी गई।

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा आदिवासी परिवारों का राशन?

ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें जून, जुलाई और अगस्त महीने का राशन नहीं मिला है। जबकि सरकार की योजना के तहत इन तीन महीनों का राशन एक साथ एडवांस में मिलना था। ग्रामीणों ने लिखित शिकायत देकर अपना पक्ष रखा है, लेकिन प्रशासन की ओर से अब तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला।

फिंगरप्रिंट ले लिया गया, पर अनाज नहीं मिला

  • ग्रामीणों का कहना है कि जून और जुलाई महीने में बायोमेट्रिक (फिंगरप्रिंट) लिया गया था, जिसका मतलब है कि वितरण की प्रक्रिया पूरी दिखाई गई।

  • लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि एक दाना भी राशन नहीं मिला।

नया डीलर आया, पुराना हटाया गया – पर जवाबदेही कौन लेगा?

पूर्व डीलर को हटाकर नया डीलर भेजा गया है, जो केवल सितंबर माह का वितरण करने की बात कर रहा है।
ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि –

“हमारा तीन महीने का राशन कौन खा गया? जिला खाद्य अधिकारी, समिति प्रबंधक या ब्लॉक के अधिकारी?”

डीलर और समिति प्रबंधक पर उठे सवाल, कार्रवाई की मांग

ग्रामीणों ने:

  • राशन डीलर को तत्काल बर्खास्त करने की मांग की है।

  • समिति प्रबंधक को पद से हटाने की भी अपील की है।

  • साथ ही, जिले और ब्लॉक के अधिकारियों की भर्ती जांच और जवाबदेही तय करने की मांग की है।

समिति प्रबंधक की सफाई

छत्रधारी जायसवाल, समिति प्रबंधक महुआ गांव ने कहा:

“परासी गांव का खाद्यान्न आवंटन 90 क्विंटल है। सितंबर माह के लिए मात्र 15 क्विंटल 80 किलो आया है। अगस्त माह का खाद्यान्न अभी जिले से नहीं आया है। जून-जुलाई के खाद्यान्न की जानकारी हमारे पास नहीं है – वह सब जिले से होता है।”

प्रशासनिक चुप्पी पर उठे सवाल

  • क्या गरीबों के हक का राशन कागजों में ही बंट गया?

  • क्या बायोमेट्रिक लेने के बावजूद वितरण न होना सिस्टम की विफलता या मिलीभगत का परिणाम है?

  • क्या जिला प्रशासन इस पूरे मामले की जांच कर जिम्मेदारों को सजा देगा?

ग्रामीणों का सवाल – “क्या सिर्फ वोट मांगने के लिए हैं हम?”

राशन के लिए रोज़ दुकान और पंचायत के चक्कर लगाने वाले ग्रामीण अब सवाल उठा रहे हैं कि क्या उनकी अहमियत सिर्फ चुनाव के समय तक है?

ग्रामीणों की मांग:

  • राशन घोटाले की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई हो।

  • बायोमेट्रिक वितरण प्रणाली की ऑडिट कराई जाए।

  • राशन वितरण को पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए।

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