राजेश व्यास/उज्जैन : श्राद्धपक्ष की चतुर्दशी पर सिद्धवट और गयाकोटा तीर्थ पर श्रद्धालुओं की अल सुबह से ही भीड़ उमड़ी हुई थी। इस दिन विशेष रूप से उन लोगों की मृत्यु के लिए तर्पण और पिंडदान किया जाता है, जिनका निधन अकाल या युवावस्था में हुआ हो।
श्रद्धालुओं ने ब्रह्म मुहूर्त में ही सिद्धवट मंदिर पर पूजा-अर्चना की और दूधाभिषेक कर पितृजनों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण किया। इस अवसर पर हजारों लोग अपने घर और व्यवसाय में उन्नति की कामना के साथ पितरों को दूध अर्पित करते हुए पहुंचे।
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पंडित सुरेंद्र चतुर्वेदी और राजेश त्रिवेदी ने बताया कि चतुर्दशी और अमावस्या का श्राद्धपक्ष में विशेष महत्व है। इस दिन किए गए तर्पण, होम और पिंडदान से तीन पीढ़ियों तक के पूर्वजों को मोक्ष और शांति की प्राप्ति होती है। पंडितों के अनुसार, जो लोग तरुण अवस्था में अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनके लिए चतुर्दशी का श्राद्ध सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
श्रद्धालुओं ने जलाभिषेक, पिंडदान और तर्पण करते हुए अपने स्वर्गवासी पूर्वजों की आत्मा की शांति और वैकुंड में वास की कामना की। बताया जाता है कि सिद्धवट तीर्थ की स्थापना माता पार्वती ने की थी और राजा विक्रमादित्य इसी वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या करते थे।











