Rajasthan University Scam : राजस्थान में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सरकारी कामकाज और राजनीतिक घोषणाओं पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। राजस्थान फर्जी यूनिवर्सिटी मामला अब पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है, क्योंकि यहां कई विश्वविद्यालय सिर्फ कागजों और किराए के कमरों में चलते मिले।जयपुर के शिक्षा संकुल में मौजूद इन विश्वविद्यालयों की जमीनी हकीकत सामने आने के बाद प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर खामियां उजागर हुई हैं। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद कई यूनिवर्सिटीज में न तो छात्र हैं, न स्थायी कैंपस और न ही कोई वास्तविक शैक्षणिक गतिविधि।
राजस्थान फर्जी यूनिवर्सिटी मामला उस समय और गंभीर हो गया जब जयपुर स्थित पुण्यश्लोका देवी अहिल्याबाई होलकर भवन में एक साथ तीन विश्वविद्यालयों के बोर्ड दिखाई दिए। इनमें बाबा आम्टे दिव्यांग विश्वविद्यालय, विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय और हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय शामिल हैं।भवन के अंदर यूनिवर्सिटी के नाम तो बड़े-बड़े बोर्ड पर लिखे मिले, लेकिन कमरों में शैक्षणिक गतिविधियां लगभग नदारद थीं। कुछ कर्मचारी मोबाइल चलाते नजर आए, जबकि कुलगुरु के कार्यालय में भी कोई सक्रियता दिखाई नहीं दी।
चार कमरे और करोड़ों का खर्च
सबसे ज्यादा सवाल राजस्थान फर्जी यूनिवर्सिटी मामला में बाबा आम्टे दिव्यांग विश्वविद्यालय को लेकर उठ रहे हैं। साल 2023 में इसे दिव्यांग छात्रों के लिए बड़े संस्थान के रूप में पेश किया गया था।हालांकि तीन साल बीतने के बाद भी यहां एक भी छात्र नहीं मिला। विश्वविद्यालय में केवल चार कमरे और सीमित स्टाफ मौजूद है। इसके बावजूद सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार यहां करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं।वेतन, वाहन, आवास और दफ्तर की सुविधाओं पर भारी रकम खर्च होने की बात सामने आई है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि बिना शैक्षणिक गतिविधियों के आखिर यह खर्च किस आधार पर किया गया।
Read more : Raipur News: PWD की बड़ी तैयारी! अब छत्तीसगढ़ में बदलने वाला है निर्माण कार्यों का पूरा सिस्टम
विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय का सपना अधूरा
राजस्थान फर्जी यूनिवर्सिटी मामला में विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय भी चर्चा में है। इस यूनिवर्सिटी को साल 2008 में बड़े स्किल डेवलपमेंट सेंटर के रूप में विकसित करने की घोषणा हुई थी।दावा किया गया था कि यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्किल कोर्स शुरू होंगे, लेकिन वर्षों बाद भी जमीनी स्तर पर कोई बड़ा ढांचा तैयार नहीं हो सका। विश्वविद्यालय मुख्य रूप से केवल एफिलिएशन देने तक सीमित रह गया है।सरकारी स्टाफ और प्रशासनिक खर्च जारी हैं, लेकिन छात्रों के लिए वास्तविक ट्रेनिंग या कोर्स संचालन लगभग नहीं के बराबर बताया जा रहा है।
राज्यपाल ने भी जताई चिंता
इस पूरे राजस्थान फर्जी यूनिवर्सिटी मामला पर राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने भी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया कि आखिर बिना छात्रों के विश्वविद्यालय कैसे संचालित हो रहे हैं।राज्यपाल की टिप्पणी के बाद अब यह मुद्दा सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का विषय भी बन गया है। विपक्ष और शिक्षा विशेषज्ञ दोनों ही जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं।
चुनावी घोषणाओं पर उठे सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्थान फर्जी यूनिवर्सिटी मामला चुनावी राजनीति से भी जुड़ा हुआ है। कई बार सरकारें चुनाव से पहले नई यूनिवर्सिटी की घोषणा कर देती हैं, लेकिन बाद में उनके लिए जरूरी संसाधन और ढांचा विकसित नहीं हो पाता।ऐसे मामलों में कुलगुरु और प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियां तो हो जाती हैं, लेकिन छात्रों और शिक्षा व्यवस्था को वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता। इसका सीधा असर सरकारी खजाने और जनता के टैक्स के पैसों पर पड़ता है।
जनता के पैसे पर बड़ा सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी इन विश्वविद्यालयों का अस्तित्व केवल कागजों तक सीमित क्यों है। राजस्थान फर्जी यूनिवर्सिटी मामला ने सरकारी योजनाओं की मॉनिटरिंग और जवाबदेही पर गंभीर बहस छेड़ दी है।शिक्षा के नाम पर अगर केवल घोषणाएं और बोर्ड ही दिखाई दें, तो इसका नुकसान सीधे छात्रों और राज्य की शिक्षा व्यवस्था को उठाना पड़ता है।









