गौरीशंकर गुप्ता/घरघोड़ा। शासन के नियम-कानून आखिर किसके लिए बनाए जाते हैं? क्या सरकारी कर्मचारियों के लिए जारी स्थानांतरण संबंधी दिशा-निर्देश केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं? घरघोड़ा क्षेत्र में वर्षों से एक ही स्थान पर जमे कुछ शासकीय कर्मचारियों की पदस्थापना को लेकर अब ऐसे ही सवाल उठने लगे हैं।
हैरानी की बात यह है कि शासन की स्थानांतरण नीति में तीन वर्ष से अधिक समय तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहने को लेकर दिशा-निर्देश होने के बावजूद कुछ कर्मचारी कथित तौर पर 25 से 30 वर्षों तक एक ही क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। आखिर ऐसा कौन सा प्रभाव है, जिसके सामने प्रशासनिक आदेश भी बेअसर साबित होते नजर आ रहे हैं?
तबादला हुआ, फिर भी कुर्सी नहीं छूटी!
क्षेत्र में चर्चा है कि कुछ प्रभावशाली कर्मचारियों के तबादला आदेश जारी होने के बावजूद राजनीतिक संपर्क और ऊंची पहुंच के चलते आदेश निरस्त हो जाते हैं। यदि ऐसा है तो यह शासन की स्थानांतरण व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
राजनीतिक संरक्षण या प्रशासनिक मजबूरी?
आरोप हैं कि कुछ कर्मचारी क्षेत्रीय राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर अपनी मनचाही पदस्थापना बनाए रखने में सफल रहते हैं। तबादले का समय आते ही कथित बिचौलियों की सक्रियता बढ़ने और तबादला करवाने अथवा रुकवाने के नाम पर लाखों रुपये के लेनदेन की चर्चाएं भी सामने आती हैं। हालांकि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
वर्षों की पदस्थापना, जवाबदेही कौन तय करेगा?
एक ही स्थान पर लंबे समय तक पदस्थ रहने वाले कर्मचारियों की कार्यप्रणाली, संपत्ति और प्रशासनिक प्रभाव की समीक्षा होनी चाहिए। आखिर आम जनता को पारदर्शी व्यवस्था देने का दावा करने वाले प्रशासन की नजर इन परिस्थितियों पर क्यों नहीं पड़ रही है?
प्रशासन से सीधे सवाल
- क्या तीन वर्ष से अधिक समय से एक ही स्थान पर जमे कर्मचारियों की समीक्षा होगी?
- बार-बार तबादला आदेश निरस्त होने के कारणों की जांच होगी?
- क्या राजनीतिक हस्तक्षेप और कथित लेनदेन की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी?
- क्या शासन के दिशा-निर्देशों का पालन सभी कर्मचारियों पर समान रूप से होगा?
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इन गंभीर सवालों पर संज्ञान लेकर कार्रवाई करता है या फिर मलाईदार कुर्सियों पर वर्षों से जमे रसूखदारों का दबदबा यूं ही कायम रहता है।