Joint Home Loan Rules After Divorce Explained: तलाक के बाद भी खत्म नहीं होती जॉइंट होम लोन चुकाने की जिम्मेदारी, जानें नियम

VIKASH KHALKHO

नई दिल्ली। Nishaanebaz.com-Joint Home Loan Rules After Divorce Explained: शादी के बाद अक्सर पति-पत्नी मिलकर जॉइंट होम लोन के जरिए अपने सपनों का घर खरीदते हैं। लेकिन यदि किसी कारणवश दोनों के बीच तलाक हो जाता है, तो कानूनन भले ही दो लोग अलग हो जाएं, वित्तीय संस्थाओं से लिया गया लोन अपने-आप खत्म नहीं होता। बैंक के लिए दोनों पार्टनर्स मुख्य कर्जदार (Co-borrowers) बने रहते हैं। जब तक बकाए कर्ज का पूरी तरह से भुगतान न हो जाए या बैंक औपचारिक बदलाव के लिए सहमत न हो, तब तक लोन एग्रीमेंट की शर्तें दोनों पर समान रूप से लागू रहती हैं।

तलाक के बाद जॉइंट होम लोन को निपटाने के लिए मुख्य रूप से तीन कानूनी और वित्तीय विकल्प उपलब्ध होते हैं। पहला विकल्प यह है कि कोई एक पार्टनर घर का पूरा मालिकाना हक और बकाए लोन की जिम्मेदारी अपने नाम पर ट्रांसफर करा ले, जिसके लिए बैंक उसकी व्यक्तिगत आय और क्रेडिट स्कोर का नए सिरे से आकलन करता है।

Read More : CG Crime News: मामूली डांट पर भतीजे ने मौसी की हत्या, नशे में डंडे से किए ताबड़तोड़ वार; आरोपी गिरफ्तार

दूसरा विकल्प आपसी सहमति से संपत्ति को बेचकर उससे प्राप्त रकम से बैंक का पूरा बकाया चुकाने का है, जिसके बाद बची हुई राशि का दोनों आपस में बंटवारा कर सकते हैं। तीसरा विकल्प यह है कि लोन समाप्त होने तक दोनों तय अनुपात में अपनी-अपनी ईएमआई (EMI) भरते रहें।

Read More : Chhattisgarh BJP President: ये कद्दावर नेता बन सकते है बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष, संगठन में बदलाव की अटकलें तेज

बैंकों को कर्जदार के व्यक्तिगत या वैवाहिक विवादों से कोई सरोकार नहीं होता; उन्हें केवल अपनी मासिक किश्तों से मतलब होता है। यदि कोर्ट तलाक के फैसले में किसी एक पार्टनर को लोन चुकाने की जिम्मेदारी दे भी दे, तब भी बैंक के रिकॉर्ड में दोनों तब तक देनदार बने रहते हैं जब तक कि ‘रिलीज डीड’ (Release Deed) की औपचारिक प्रक्रिया पूरी न हो जाए।

Read More : CM Yogi Adityanath: बहन के इलाज के लिए CM योगी के जनता दर्शन में पहुंचा भाई, दर्द सुनते ही लिया फैसला; लखनऊ भेजकर शुरू कराया इलाज

ऐसे में यदि कोई भी एक पक्ष ईएमआई भरने से मुकरता है या डिफॉल्ट करता है, तो इसका सीधा असर दोनों के सिबिल (CIBIL) स्कोर पर पड़ता है। इस तरह के जोखिमों से बचने के लिए विशेषज्ञों की सलाह है कि जॉइंट लोन लेते समय ही एक ‘को-ओनरशिप एग्रीमेंट’ (Co-ownership Agreement) बनवा लेना चाहिए, जिसमें भविष्य के विवादों की स्थिति में ईएमआई भुगतान और मालिकाना हक की शर्तें स्पष्ट रूप से दर्ज हों।

Share The News
Share This Article
विकास कुमार खलखो एक डिजिटल पत्रकार, समाचार संपादक और SEO कंटेंट क्रिएटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में एक दशक से अधिक का अनुभव है। उन्होंने BJMC, Master of Journalism (MJ) और M.Phil. (मीडिया स्टडीज़) की डिग्री हासिल की है और दबंग दुनिया, हमर छत्तीसगढ़ योजना, हरिभूमि, सन स्टार डेली न्यूज़ और छत्तीसगढ़ की आवाज़ जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है। उन्हें हिंदी पत्रकारिता, ब्रेकिंग न्यूज़ कवरेज, SEO-फ्रेंडली कंटेंट राइटिंग, डिजिटल पब्लिशिंग, कंटेंट स्ट्रैटेजी, थंबनेल डिज़ाइन और सोशल मीडिया मैनेजमेंट में विशेष महारत हासिल है। उनका उद्देश्य सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों तक प्रभावशाली समाचार पहुँचाना और साथ ही उच्च गुणवत्ता वाला डिजिटल कंटेंट तैयार करना है।
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *