MP News : मऊगंज — एक 60 वर्षीय बुज़ुर्ग अशोक सिंह की मौत ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था आम आदमी के लिए वाकई ज़िंदा है? शुक्रवार को जिस तरह से इलाज के इंतजार में एक जीवन बुझ गया, उसे सामान्य मौत कहना अन्याय होगा। यह एक संस्थागत विफलता थी, एक तंत्र की हत्या।
परिवार के अनुसार, अशोक सिंह को गंभीर श्वसन दिक्कतें थीं। सुबह 9:10 बजे 108 एंबुलेंस को कॉल किया गया, लेकिन दो घंटे तक कोई मदद नहीं पहुंची। 11:14 बजे जवाब मिला — “दो घंटे और लगेंगे।” इसके बाद गांववालों ने उन्हें खटिया पर तिरपाल में लपेटकर कीचड़ भरी पगडंडी से मुख्य सड़क तक पहुंचाया।
स्थानीय युवक मनीष मिश्रा ने मानवीयता दिखाते हुए अपनी निजी गाड़ी से अशोक सिंह को मऊगंज के सरकारी अस्पताल पहुंचाया। लेकिन यहां की कहानी और भी भयावह थी। मृतक के परिजन कृष्ण कुमार सिंह के मुताबिक, डॉक्टर ने मरीज़ को देखना तक ज़रूरी नहीं समझा। डॉक्टर पंकज पांडे ने कहा — “ये केस हमारे बस का नहीं, हनुमना ले जाइए, यहां कोई धर्मशाला नहीं चल रही।”
ना प्राथमिक इलाज मिला, ना भर्ती किया गया और ना ही कोई रेफर पर्ची दी गई। उल्टा परिजनों को धमकाया गया — “पर्ची फाड़ दूंगा।” अस्पताल में डॉक्टर की बेरुखी ने परिजनों को तोड़ दिया और उसी दौरान अशोक सिंह ने दम तोड़ दिया।
ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. प्रद्युम्न शुक्ला ने भी माना कि “मरीज़ को ना भर्ती किया गया, ना रेफर किया गया।” यह बयान ही प्रशासन की असंवेदनशीलता की पुष्टि करता है।











