रायपुर: छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य इलाके में कोयला खनन को लेकर एक बार फिर विवाद तेज हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रदेश दौरे से ठीक पहले राज्य सरकार ने केते एक्सटेंशन ओपन कास्ट कोल माइनिंग प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। अडाणी समूह इस परियोजना का MDO है। पर्यावरण कार्यकर्ता इसे हसदेव के जंगलों के लिए बड़ा खतरा बता रहे हैं, क्योंकि इस परियोजना में लगभग 7 लाख पेड़ों के कटने की आशंका है।
TS सिंहदेव का हमला: “राम की निशानी बारूद के ढेर पर”
पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने इस मंजूरी को “विनाश का रास्ता” बताते हुए कहा कि हसदेव अरण्य केवल जंगल नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और पारंपरिक धरोहर है। उनका आरोप है कि सरकार धार्मिक और पुरातात्विक स्थल रामगढ़ पहाड़ी को नष्ट करने की अनुमति दे रही है, जहां अब बारूद के ढेर लगाए जा रहे हैं।
पानी 100 फीट नीचे, हवा 50 प्वाइंट ज़्यादा जहरीली—विशेषज्ञों की चेतावनी
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस खनन परियोजना के सक्रिय होते ही—
- इलाके में भूजल स्तर 100 फीट तक नीचे चले जाने का खतरा है
- वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में 50 पॉइंट तक वृद्धि का अनुमान
- जल स्रोतों के सूखने की आशंका
- स्थानीय गांवों में फेफड़ों और श्वसन रोग बढ़ने का खतरा
एलीफेंट कॉरिडोर पर भी खतरा
हसदेव अरण्य एलीफेंट कॉरिडोर के रूप में जाना जाता है। लेकिन वन विभाग के अनुमतिपत्र में दावा किया गया है कि 10 किमी के दायरे में न तो ऐतिहासिक स्थल है और न ही एलीफेंट कॉरीडोर।
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परंतु हसदेव बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं के अनुसार—
- 3 किमी दूर ऐतिहासिक रामगढ़ पहाड़ी स्थित है
- पूरा इलाका एलीफेंट मूवमेंट जोन है
- हाथियों के मार्ग अवरुद्ध होने से ह्यूमन–एलिफेंट कॉन्फ्लिक्ट बढ़ेगा
1742 हेक्टेयर वन भूमि, 4.48 लाख पेड़… पर वास्तविक संख्या 7 लाख?
मंजूरी पत्र के अनुसार परियोजना में—
- कुल भूमि: 1742.600 हेक्टेयर
- वन भूमि: 1742.155 हेक्टेयर
- परियोजना लागत: 2344 करोड़ रुपये
- घोषित कटने वाले पेड़: 4,48,874
हालांकि आंदोलनकारियों का दावा है कि वास्तविक संख्या 7 लाख के आसपास है।
राजनीति में झंडा युद्ध: बीजेपी बनाम कांग्रेस
जहां कांग्रेस इसे “पर्यावरण विनाश” बता रही है, वहीं बीजेपी इसे “विकास की दिशा में कदम” मान रही है।बीजेपी जांच समिति ने दावा किया कि खनन से रामगढ़ पहाड़ी को कोई नुकसान नहीं हो रहा, वहीं कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी वास्तविक तथ्यों को छुपा रही है।
बड़ा सवाल—क्या विकास की दौड़ में छत्तीसगढ़ अपनी हरियाली खो रहा है?
हसदेव के जंगलों में तेज़ी से बढ़ती खनन गतिविधियों ने यह चिंता पैदा कर दी है कि कहीं विकास के नाम पर राज्य अपनी असली पहचान—हरी झरियों, जैव विविधता, आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक धरोहर—को तो नहीं खो रहा?













