नई दिल्ली: केंद्र सरकार और आयकर विभाग (Income Tax Department) अघोषित विदेशी आय और संपत्ति से जुड़े कड़े कानून, ब्लैक मनी एक्ट (BMA), 2015 के कुछ कठोर प्रावधानों की समीक्षा करने जा रहा है। विभाग ने इस कानून से जुड़ी कानूनी चुनौतियों और कार्यान्वयन की दिक्कतों का अध्ययन करने के लिए एक आंतरिक कमेटी का गठन किया है।
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समीक्षा के मुख्य बिंदु:
- कमेटी, जिसकी अगुवाई उत्तर प्रदेश (पूर्व) के प्रिंसिपल चीफ इनकम टैक्स कमिश्नर अमल पुष्प कर रहे हैं, वह BMA और सामान्य आयकर कानूनों के बीच टकराव को देखेगी।
- मुख्य फोकस BMA के सबसे सख्त नियम पर है, जो आयकर विभाग को दशकों पुरानी अघोषित विदेशी संपत्ति पर सवाल उठाने की असीमित शक्ति देता है।
- सामान्य आयकर कानूनों में टैक्स चोरी की जांच की समय सीमा (3-5 साल) होती है, लेकिन BMA में कोई सीमा नहीं है। इस प्रावधान से करदाताओं को पुराने रिकॉर्ड्स न होने के कारण सोर्स साबित करने में दिक्कतें आती हैं।
भारी पेनल्टी और सजा पर भी विचार:
- BMA के तहत अघोषित संपत्ति पर 30% टैक्स और 90% पेनल्टी लग सकती है, जिससे कुल देनदारी 120% हो जाती है (जो सामान्य आईटी कानून से अधिक है)।
- कानून के तहत विदेशी संपत्ति की जानकारी न देना ही एक अपराध है, जिसके कारण मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (PMLA) के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी कार्रवाई कर सकता है।
टैक्स विशेषज्ञों की राय: विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने रिकॉर्ड्स न होने की समस्या को देखते हुए इस कठोर नियम की समीक्षा आवश्यक है। कई विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि सरकार को उन लोगों को राहत देनी चाहिए जिन्होंने वैध तरीके से संपत्ति बनाई, लेकिन भारत में टैक्स रेजिडेंट बनने के बाद उसे घोषित नहीं किया।
नई डिस्क्लोजर स्कीम की मांग: राजस्व बढ़ाने और करदाताओं को राहत देने के लिए, कुछ विशेषज्ञ 2015 जैसी एक नई स्वैच्छिक खुलासा योजना (New Disclosure Scheme) लाने की मांग कर रहे हैं, ताकि लोग कानूनी कार्रवाई से बचकर अपनी अघोषित संपत्ति घोषित कर सकें।
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इसके साथ ही, एक दूसरी कमेटी टैक्स इन्वेस्टिगेशन की गुणवत्ता सुधारने पर काम कर रही है, जिससे यह संकेत मिलता है कि सरकार टैक्स कानून के ढांचे को अधिक प्रभावी और न्यायसंगत बनाने की दिशा में काम कर रही है।









