नई दिल्ली। अक्सर सुना जाता है कि पितृपक्ष में नया कार्य शुरू करना या निवेश करना शुभ नहीं माना जाता। मांगलिक कार्य भी इस दौरान नहीं किए जाते। ज्योतिष और विज्ञान के अनुसार, इसका मुख्य कारण चंद्रमा का मन और मस्तिष्क पर असर है।
चंद्रमा का प्रभाव:
पितृपक्ष के समय चंद्रमा पृथ्वी के अधिक निकट होता है। ज्योतिष के अनुसार, चंद्रमा जल तत्व का प्रतीक है और मनुष्य के शरीर में 70 प्रतिशत जल मौजूद होता है। इस दौरान चंद्रमा की आकर्षण शक्ति अधिक होने से मन और मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। यही कारण है कि इस समय गंभीर निर्णय लेने वाले कार्यों पर मनाही लगाई गई है।
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वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
साइंस के अनुसार, चंद्रमा का प्रभाव समुद्र में ज्वार-भाटा पैदा करता है। इसी तरह मानव शरीर में जल तत्व पर भी इसका असर होता है। मानसिक रोगों से पीड़ित लोगों पर इसका प्रभाव अधिक दिखाई देता है। पूर्णिमा के दिन ऐसे लोगों की स्थिति अधिक विचलित रहती है।
शास्त्रीय दृष्टिकोण:
शास्त्रों में कहा गया है कि ‘चंद्रमा मनसो जातः’, यानी चंद्रमा का जन्म मन से हुआ है। इसलिए चंद्रमा सीधे मन पर असर डालता है। पितृपक्ष के दौरान चंद्रमा की कलाओं और पितरों के तर्पण/श्राद्ध कर्मकांडों से संबंध के चलते नए कार्यों से बचने की परंपरा रही है।
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सकारात्मक दृष्टिकोण:
इस समय को नकारात्मक नहीं समझना चाहिए। पितृपक्ष का समय अध्ययन, चिंतन और मनन के लिए उपयोगी है। नए विचारों की योजना बनाना और उनके लाभ-हानि का आकलन करना इस समय बेहतर होता है।













