Dairy Farming: डेयरी फार्मिंग को अक्सर लोग दूध बेचकर कमाई करने वाला कारोबार मानते हैं, लेकिन इससे आमदनी बढ़ाने के दूसरे रास्ते भी निकल सकते हैं। पशुओं से मिलने वाले गोबर और गोमूत्र का उपयोग सही तरीके से किया जाए, तो ये अतिरिक्त आय का जरिया बन सकते हैं। हालांकि, डेयरी व्यवसाय में अच्छा मुनाफा कमाने के लिए पशुओं की देखभाल से लेकर खर्चों के हिसाब तक, हर पहलू पर ध्यान देना जरूरी है।
दूध के अलावा कमाई के 3 तरीके
गोबर से बनाएं जैविक खाद
डेयरी फार्म में रोजाना निकलने वाले गोबर का इस्तेमाल जैविक खाद तैयार करने के लिए किया जा सकता है। स्थानीय किसानों, नर्सरी संचालकों और बागवानी करने वालों के बीच इसकी मांग होने पर इसे बेचकर अतिरिक्त कमाई की संभावना बन सकती है। खाद तैयार करने और बेचने से पहले उसकी गुणवत्ता, पैकेजिंग और स्थानीय बाजार की जरूरतों को समझना जरूरी है।
गोबर के उपले बेचें
गोबर से उपले बनाकर बेचना भी कमाई का एक विकल्प हो सकता है। कुछ इलाकों में इनका इस्तेमाल पारंपरिक ईंधन और धार्मिक कार्यों में किया जाता है। यदि आसपास के बाजार में उपलों की मांग है, तो डेयरी संचालक इन्हें तैयार करके बेच सकते हैं। इस काम में गोबर सुखाने के लिए पर्याप्त जगह और मौसम का ध्यान रखना होगा।
गोमूत्र का उपयोग और बिक्री
गोमूत्र का इस्तेमाल कुछ कृषि संबंधी उत्पादों को तैयार करने में किया जाता है। डेयरी संचालक इसके प्रसंस्करण और बिक्री की संभावनाएं तलाश सकते हैं। हालांकि, कोई उत्पाद तैयार करने या बेचने से पहले उसकी उपयोगिता, सुरक्षित प्रसंस्करण, स्थानीय मांग और लागू नियमों की जानकारी लेना जरूरी है। केवल गोमूत्र इकट्ठा कर लेने से नियमित कमाई की गारंटी नहीं होती।
डेयरी फार्म में खुद भी रखें नजर
डेयरी फार्मिंग का कारोबार केवल पशु खरीदने और दूध बेचने तक सीमित नहीं है। पशुओं का संतुलित आहार, साफ-सफाई, समय पर इलाज और नियमित निगरानी दूध उत्पादन के साथ कारोबार की लागत को भी प्रभावित करते हैं। डेयरी संचालक को पूरी जिम्मेदारी मजदूरों पर छोड़ने के बजाय खुद भी फार्म की गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए।
कारोबार शुरू करने से पहले बनाएं हिसाब
डेयरी शुरू करने से पहले पशुओं की खरीद, चारा, मजदूरी, इलाज और रखरखाव का अनुमानित खर्च निकालें। इसके बाद दूध के साथ गोबर से तैयार खाद, उपलों और गोमूत्र आधारित उत्पादों की संभावित बिक्री का आकलन करें। स्थानीय बाजार में मांग और उत्पादन लागत को समझकर ही योजना बनाएं। इन अतिरिक्त स्रोतों से होने वाली कमाई परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।


