रायपुर | रायपुर के रियल इस्टेट बाजार में एक बड़ा खेल चल रहा है, जिसने राज्य को काली कमाई खपाने का अड्डा बना दिया है। सरकारी गाइडलाइन रेट को जानबूझकर इतना कम रखा गया है कि इसका सीधा फायदा बिल्डरों, भूमाफियाओं और भ्रष्ट अधिकारियों को हो रहा है। आइए जानते हैं, इस पूरे खेल की क्या वजह है और इसका खामियाजा आम जनता को क्यों भुगतना पड़ रहा है।
क्या है गाइडलाइन रेट का खेल?
असल में, रायपुर के पॉश इलाकों में जमीन का बाजार भाव 7,000 रुपए प्रति वर्ग फुट तक है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में इसका रेट सिर्फ 1,000 रुपए दर्ज है। इसी भारी अंतर का फायदा उठाकर सारा मनी लॉन्ड्रिंग होता है। ग्राहक से पैसे लेते समय बिल्डर सिर्फ सरकारी रेट की राशि बैंक ट्रांसफर से लेता है, जबकि बाकी की 70-80 प्रतिशत रकम नकद (कैश) में ली जाती है। इस फर्जीवाड़े से बिल्डर को टैक्स में बड़ा फायदा मिलता है, क्योंकि वह सिर्फ 1000 रुपए के हिसाब से टैक्स भरता है, न कि 7000 रुपए के हिसाब से।
आम आदमी को क्यों हो रहा नुकसान?
यह काला कारोबार सिर्फ रसूखदारों को फायदा पहुंचाता है। आम आदमी और किसानों को इसकी दोहरी मार झेलनी पड़ती है:
- लोन की दिक्कत: जब कोई आम आदमी घर खरीदने जाता है, तो बैंक से लोन सरकारी रेट पर ही मिलता है। 70 लाख के मकान के लिए उसे सिर्फ 15-20 लाख का लोन मिल पाता है, और बाकी के पैसों का इंतजाम उसे खुद करना पड़ता है।
- किसानों का नुकसान: सरकारी परियोजनाओं के लिए जिन किसानों की जमीनें ली जाती हैं, उन्हें भी कम मुआवजा मिलता है। क्योंकि सरकार जमीन की कीमत बेहद कम सरकारी गाइडलाइन रेट के आधार पर ही तय करती है।
इस पूरे खेल में नेताओं और अधिकारियों का पैसा लगा होने की बात कही जाती है, यही वजह है कि पिछले आठ सालों से गाइडलाइन रेट में एक पैसे की भी बढ़ोतरी नहीं हुई है।











