गौरी शंकर गुप्ता/घरघोड़ा। Gharghoda Diwali Feature: त्योहारों का मौसम नजदीक आते ही बाजारों में रौनक और रोशनी की उमंग छा जाती है। प्रकाश के पावन पर्व दीपावली के स्वागत के लिए हर तरफ भव्य तैयारियां शुरू हो जाती हैं। हालांकि, इस चकाचौंध के बीच एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि जहां एक तरफ आधुनिक बिजली की रंग-बिरंगी झालरें और चाइनीज लाइटें घर-घर की सजावट बढ़ा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ सदियों पुरानी मिट्टी के दीयों से जुड़ी परंपरा और उन्हें गढ़ने वाले कुम्हारों का जीवन धीरे-धीरे हाशिए पर जाता दिख रहा है। कभी दीपावली का मतलब मिट्टी के सोंधे दीयों से सजे आंगन, मनमोहक रंगोली और तेल-घी से टिमटिमाते प्रकाश से होता था, जो न केवल घरों को बल्कि कुम्हारों के जीवन को भी रोशन करता था।
समय के बदलाव के साथ आधुनिकता की अंधी दौड़ ने तस्वीर पूरी तरह पलट दी है। लोग अब पारंपरिक दीयों के बजाय कृत्रिम झालरों और लाइटों को ज्यादा प्राथमिकता देने लगे हैं। हालांकि, इन झालरों की कृत्रिम रोशनी में वह आत्मीयता और अपनापन नहीं होता, जो मिट्टी के दीए की वास्तविक लौ और उसकी सोंधी खुशबू में छिपा होता है। छत्तीसगढ़ के घरघोड़ा और आसपास के ग्रामीण अंचलों में कई कुम्हार परिवार आज भी अपनी पुश्तैनी विरासत को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पहले दीपावली के महीने भर पहले से उनके घरों में चाक की रफ्तार तेज हो जाती थी, परिवार के सभी सदस्य दीए सुखाने और रंगने में जुट जाते थे, क्योंकि साल भर की आजीविका का बड़ा आधार यही त्योहारी सीजन होता था।
वर्तमान स्थिति यह है कि रंग-बिरंगी लाइटों के बाजार में आने से कुम्हारों के रोजगार पर गहरा आघात पहुंचा है। मिट्टी, ईंधन और रंगों की बढ़ती लागत के मुकाबले खरीदारों की संख्या काफी कम हो चुकी है। घरघोड़ा के स्थानीय कुम्हार शिवनाथ बताते हैं कि पहले वे दीपावली से 15-20 दिन पहले तक 20 हजार से अधिक दीए बेच लेते थे, लेकिन अब बमुश्किल 4 से 5 हजार दीए ही बिक पाते हैं। इस वर्ष बेमौसम बारिश ने भी दीयों के निर्माण और उन्हें सुखाने में बड़ी बाधा उत्पन्न की। कुम्हार शिवनाथ की पत्नी सेमलदई भी भावुक होकर बताती हैं कि वे पूरे साल इसी उम्मीद में मेहनत करती हैं कि दीपावली पर कुछ आमदनी होगी, लेकिन बाजार में झालरों के वर्चस्व के कारण उनके दीयों को कोई नहीं पूछता। उनके पास इस पुश्तैनी काम के अलावा आजीविका का कोई अन्य साधन नहीं है।
सांस्कृतिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी मिट्टी के दीए हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। ये पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित और इको-फ्रेंडली होते हैं, जबकि प्लास्टिक आधारित बिजली की झालरें प्रदूषण बढ़ाने के साथ ऊर्जा की खपत भी करती हैं। एक छोटा सा दिया इस बात का प्रतीक है कि कितनी भी गहरी अंधेरी रात क्यों न हो, एक छोटी सी लौ उसे मिटाने के लिए काफी होती है। अब समय आ गया है कि हम अपनी इस प्राचीन संस्कृति को सहेजें और इस दीपावली अपने घरों को रोशन करने के साथ-साथ उन मेहनतकश कुम्हारों के घरों में भी खुशियों के दीप जलाएं, जिनके हाथों ने इस माटी को जीवन दिया है।


