CG NEWS : बिलासपुर : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में 22 साल पुराने रिश्वत मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया। न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकलपीठ ने निचली अदालत के फैसले को निरस्त करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांग और स्वीकार को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
CG NEWS : यह मामला वर्ष 2004 का है, जब साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) में कार्यरत एक कर्मचारी ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन पर्सनल मैनेजर ने पीएफ से 2.5 लाख रुपये की अग्रिम राशि स्वीकृत कराने के लिए 5,000 रुपये रिश्वत मांगी थी। शिकायत के बाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने ट्रैप कार्रवाई कर आरोपी को 27 फरवरी 2004 को गिरफ्तार किया था।
बाद में सीबीआई कोर्ट रायपुर ने 2006 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए एक-एक वर्ष की सजा और जुर्माना लगाया था। हालांकि, अपील के दौरान आरोपी की मृत्यु हो गई और उनकी पत्नी ने कानूनी प्रतिनिधि के रूप में मामला आगे बढ़ाया।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण कमियां पाईं। अदालत ने कहा कि रिश्वत के मामलों में “डिमांड” यानी मांग साबित होना सबसे जरूरी तत्व है, जबकि इस मामले में यह केवल शिकायतकर्ता के बयान पर आधारित था। इसे किसी स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य से पुष्ट नहीं किया जा सका।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पैसे की बरामदगी से अपराध सिद्ध नहीं होता। जिस दस्तावेज के आधार पर रिश्वत की बात कही गई, उसका मूल रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया, बल्कि सिर्फ फोटोकॉपी ही अदालत में प्रस्तुत की गई। गवाहों के बयान भी एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे और ट्रैप गवाहों ने केवल पैसे मिलने की पुष्टि की, मांग की नहीं।
CG NEWS : आरोपी ने अपने बचाव में कहा था कि उसने रिश्वत नहीं मांगी थी और शिकायतकर्ता ने जबरन पैसे देने की कोशिश की थी। अदालत ने माना कि यह संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती।
CG NEWS : इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में रिश्वत की मांग और स्वीकार दोनों का साबित होना जरूरी है। केवल पैसे मिलना पर्याप्त नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी की दोषसिद्धि और सजा को पूरी तरह रद्द करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया।











