निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : गुजरात हाईकोर्ट का एक हालिया फैसला देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। कोर्ट ने कहा कि पति द्वारा पत्नी को एक थप्पड़ मारने की एकल घटना को अपने आप में ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता, जब तक कि लगातार और असहनीय उत्पीड़न के ठोस सबूत मौजूद न हों।
यह मामला वर्ष 1996 से जुड़ा है। अपीलकर्ता दिलीपभाई मंगलाभाई वरली ने 2003 में सेशंस कोर्ट द्वारा सुनाई गई 7 साल की सजा को चुनौती दी थी। उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत दोषी ठहराया गया था।
क्या थे आरोप?
महिला पक्ष का आरोप था कि पति रोजाना परेशान करता था और मारपीट करता था, जिससे तंग आकर महिला ने आत्महत्या की। यह भी कहा गया कि पति रात में आय बढ़ाने के लिए बैंजो बजाने जाता था, जिसे पत्नी पसंद नहीं करती थी और इसी बात को लेकर अक्सर विवाद होता था।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
जस्टिस गीता गोपी ने अपने आदेश में कहा कि क्रूरता साबित करने के लिए लगातार और गंभीर मारपीट या उत्पीड़न के स्पष्ट और ठोस प्रमाण जरूरी हैं। अदालत ने पाया कि मामले में ऐसे पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए, जो आत्महत्या के लिए उकसाने या क्रूरता को साबित कर सकें।
सजा रद्द
हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई 7 साल की सजा को रद्द करते हुए आरोपी को राहत दी। कोर्ट ने कहा कि एक बार की घटना—जैसे एक थप्पड़—को व्यापक संदर्भ और साक्ष्यों के बिना ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
इस फैसले के बाद कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के बीच वैवाहिक विवाद, घरेलू हिंसा और ‘क्रूरता’ की कानूनी परिभाषा को लेकर बहस तेज हो गई है।













