Singrauli Child Labour Case : सिंगरौली। मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले से व्यवस्था को शर्मसार करने वाली एक तस्वीर सामने आई है। यहाँ के ग्राम मुड़वनिया (ग्राम पंचायत बरहपान) में बैगा समाज का एक 12 वर्षीय मासूम कलम थामने की उम्र में फावड़ा और मजदूरी का बोझ उठाने को मजबूर है। यह मामला न केवल बाल श्रम की ओर इशारा करता है, बल्कि सरकार की उन तमाम योजनाओं पर भी सवालिया निशान लगाता है जो ‘सबके साथ और सबके विकास’ का दावा करती हैं।
कैमरे में कैद हुई ‘बचपन की मजबूरी’: स्थानीय नीलम कुमार जायसवाल द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो में बच्चे की लाचारी साफ नजर आ रही है। जिस उम्र में इस बच्चे को स्कूल की वर्दी में होना चाहिए था, उस उम्र में वह परिवार का पेट पालने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहा है। बैगा समाज, जिसे शासन द्वारा विशेष संरक्षित जनजाति का दर्जा प्राप्त है, उसके एक बच्चे की यह स्थिति शासन के विशेष विकास दावों की पोल खोलती है।
योजनाओं के बड़े दावे, जमीनी हकीकत शून्य: सरकार शिक्षा का अधिकार (RTE), उज्ज्वला योजना और पोषण आहार जैसे दर्जनों अभियान चला रही है, लेकिन मुड़वनिया के इस बच्चे तक शायद ये योजनाएं केवल कागजों पर ही पहुंची हैं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में रोजगार का भारी अभाव है और सरकारी राशन व सहायता के अभाव में परिवार बच्चों को मजदूरी पर भेजने के लिए विवश हैं।
प्रशासनिक अनदेखी पर सवाल: अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जिला प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी इन दूरस्थ इलाकों का दौरा क्यों नहीं करते? क्या इन मासूमों का भविष्य सिर्फ सरकारी फाइलों और विज्ञापनों तक ही सीमित रहेगा? सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि प्रशासन तत्काल इस बच्चे का स्कूल में दाखिला सुनिश्चित करे और परिवार को पात्रता अनुसार सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाए।













