Monday, September 7, 2026
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Chhattisgarh हाईकोर्ट की शिक्षा विभाग को फटकार, प्रमोशन से वंचित करना अन्यायपूर्ण

Bilaspur High Court:

बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि किसी अधिकारी या कर्मचारी को सभी पात्रताएं पूरी करने के बावजूद पदोन्नति से वंचित रखना न केवल अन्यायपूर्ण बल्कि भेदभावपूर्ण भी है। जस्टिस संजय जायसवाल की एकलपीठ ने प्रमोशन से वंचित शिक्षक के पक्ष में फैसला देते हुए शिक्षा विभाग के आदेश को निरस्त कर दिया।

1989 में नियुक्ति, फिर भी प्रमोशन में अड़चन

यह मामला शिक्षक दिनेश कुमार राठौर से जुड़ा है, जिनकी पहली नियुक्ति 26 अप्रैल 1989 को हुई थी। लंबे समय तक सेवा देने के बाद उन्हें 2 फरवरी 2009 को उच्च वर्ग शिक्षक के पद पर पदोन्नति दी गई थी। इसके साथ ही 18 अगस्त 2008 से उनकी वरिष्ठता भी तय की गई थी। नियमों के मुताबिक, पांच वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद वे व्याख्याता पद के लिए पूरी तरह पात्र हो गए थे।

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सीनियर को नजरअंदाज कर जूनियर को किया प्रमोट

छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा राजपत्रित सेवा (स्कूल स्तर सेवा) भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2008 के अनुसार व्याख्याता के सभी पद पदोन्नति से भरे जाने थे। इसके बावजूद विभागीय पदोन्नति समिति ने 19 जून 2012 को जारी आदेश में याचिकाकर्ता से जूनियर शिक्षकों को प्रमोट कर दिया, जबकि उनके प्रकरण पर विचार ही नहीं किया गया।

 डिग्री थी, फिर भी दावा किया गया खारिज

शिक्षा विभाग ने यह तर्क दिया कि 1 अप्रैल 2010 को याचिकाकर्ता के पास स्नातकोत्तर उपाधि नहीं थी। हालांकि, रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि उन्होंने 16 अप्रैल 2012 को PG डिग्री हासिल कर ली थी, जबकि प्रमोशन आदेश 19 जून 2012 को जारी किया गया था। यानी पदोन्नति की तारीख पर वे सभी शैक्षणिक योग्यताएं पूरी कर चुके थे।हाईकोर्ट ने विभाग की इस दलील को अस्वीकार करते हुए आदेश को रद्द कर दिया और शिक्षक के साथ हुए अन्याय को स्वीकार किया।

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