INR at 90/USD : नई दिल्ली: भारतीय रुपया आज अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया है। लगातार इक्विटी आउटफ्लो (पूँजी का देश से बाहर जाना) और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते (ट्रेड डील) को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण रुपया पहली बार $1 = ₹90 का मनोवैज्ञानिक आंकड़ा पार कर गया। ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के मुताबिक, 31 दिसंबर 2024 से 3 दिसंबर 2025 के बीच भारतीय रुपये में 5.08 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिसके चलते यह इंडोनेशियाई रुपिया के बाद एशियाई करेंसी में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गई है।
INR at 90/USD : RBI की ‘नरम’ नीति बनी तेज गिरावट की वजह
करेंसी एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी (MPC) की बैठक आज (3 दिसंबर) से शुरू हो गई है, ऐसे में रुपये में यह तेज़ गिरावट चिंता का विषय बनी हुई है। एक्सपर्ट्स को डर है कि सेंट्रल बैंक इस गिरावट को रोकने के लिए सीमित दखल की नीति पर कायम रह सकता है और करेंसी को बाजार की स्वाभाविक चाल पर गिरने दे सकता है। इंडिया फॉरेक्स एसेट मैनेजमेंट-IFA ग्लोबल के फाउंडर और CEO अभिषेक गोयनका ने कहा कि RBI संभवतः दखल देने के लिए नरम अप्रोच अपना रहा है, क्योंकि उसके पास पहले से ही NDF (नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड) समेत फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स की काफी कमी है, इसलिए वह अपनी दखल देने की शक्ति का समझदारी से इस्तेमाल करना चाहता है।
INR at 90/USD : एक्सपोर्ट्स को राहत, इंपोर्ट्स होंगे महंगे
LKP सिक्योरिटीज के जतीन त्रिवेदी ने इस बात पर जोर दिया कि RBI के हल्के दखल की वजह से ही रुपये में तेज़ी से डेप्रिसिएशन हुआ है। हालांकि, कुछ डीलर्स का मानना है कि RBI ने इस कमजोर करेंसी में व्यापार घाटे से निपटने का एक तरीका खोज लिया है। दरअसल, कमजोर करेंसी के सहारे देश के एक्सपोर्ट्स को राहत मिलेगी, जिससे निर्यात को बढ़ावा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर आयात (Import) महंगे हो जाएंगे। मार्केट को उम्मीद है कि 5 दिसंबर को RBI की पॉलिसी अनाउंसमेंट के साथ यह साफ़ हो जाएगा कि सेंट्रल बैंक करेंसी को स्टेबल करने के लिए कोई बड़ा कदम उठाता है या नहीं।
INR at 90/USD : ‘किसी खास लेवल को टारगेट नहीं करता’ RBI
रुपये की गिरावट के बीच RBI की नीति को लेकर चिंता बनी हुई है। करेंसी एक्सपर्ट्स का कहना है कि सेंट्रल बैंक मॉनेटरी पॉलिसी में करेंसी के डेप्रिसिएशन को स्वीकार करेगा, लेकिन किसी भी खास लेवल पर सिग्नल देने से बचेगा। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि सेंट्रल बैंक रुपये के “किसी खास लेवल को टारगेट नहीं करता” और इसके बजाय अस्वाभाविक उतार-चढ़ाव को रोकने को प्राथमिकता देता है। उन्होंने रुपये की हालिया कमजोरी को बाजार की स्वाभाविक चाल का नतीजा बताया था और कहा था कि लगभग 3-3.5 फीसदी की सालाना गिरावट लॉन्ग-टर्म ट्रेंड्स के हिसाब से ही है, जो MPC को ग्रोथ को सपोर्ट करने के लिए रेट कट की गुंजाइश भी देती है।
INR at 90/USD : एशियाई और इमर्जिंग मार्केट में सबसे खराब प्रदर्शन
भारतीय रुपये की गिरावट केवल घरेलू चिंता का विषय नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक बन गई है। 31 दिसंबर 2024 से 3 दिसंबर 2025 के बीच भारतीय रुपये में 5.08 फीसदी की गिरावट आई है, जो इसे इंडोनेशियाई रुपिया (3.17% गिरावट) के बाद एशियाई करेंसी में सबसे खराब परफॉर्म करने वाली करेंसी बनाती है। इमर्जिंग मार्केट्स (EMs) में भी भारतीय रुपया, अर्जेंटीना के पेसो (29.18% गिरावट) और तुर्की के लीरा (16.69% गिरावट) के बाद, तीसरी सबसे खराब परफॉर्म करने वाली करेंसी बन गया है।













