International Crimes Tribunal : ढाका/नई दिल्ली। बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश के इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल (ICT) द्वारा पिछले साल छात्र आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और कई मौतों के लिए मानवता के खिलाफ अपराध में दोषी ठहराया गया है और मौत की सजा सुनाई गई है। इस ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप से विस्फोटक फैसले के बाद अब हसीना का राजनीतिक भविष्य गहरे संकट में आ गया है। आवामी लीग, जो दशकों से बांग्लादेश की प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही है, उसके अस्तित्व पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है।
अब शेख हसीना के पास सिर्फ दो रास्ते
कानूनी तौर पर हसीना के पास मौत की सजा के खिलाफ अपील करने का विकल्प मौजूद है, लेकिन ICT कानून की धारा 21 इसे बेहद कठिन बना देती है।
पहला रास्ता — बांग्लादेश लौटकर आत्मसमर्पण / गिरफ्तारी
International Crimes Tribunal : ICT कानून के अनुसार—
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मौत की सजा पाए दोषी
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30 दिनों के भीतर अदालत में आत्मसमर्पण करें या
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गिरफ्तारी दें
तभी सुप्रीम कोर्ट की अपील डिवीजन में फैसले के खिलाफ अपील संभव है।
अंतिम तारीख 17 दिसंबर 2025 है।
इसके बाद अपील का अधिकार स्वतः समाप्त हो जाएगा, और सजा अंतिम मानी जाएगी।
यदि हसीना आत्मसमर्पण करती हैं, तो सुप्रीम कोर्ट को 60 दिनों के भीतर फैसला देना अनिवार्य होगा—यानी अधिकतम 15 फरवरी 2026 तक।
दूसरा रास्ता — भारत में शरण जारी रखना, अपील का अधिकार खो देना
हसीना 5 अगस्त 2024 से नई दिल्ली में शरण लिए हुए हैं।
उन्होंने ICT को ‘फर्जी, धांधलीभरी और राजनीतिक रूप से प्रेरित अदालत’ कहा है।
इस स्थिति में उनके बांग्लादेश लौटने की संभावना बहुत कम है।
International Crimes Tribunal : यदि वे वापस नहीं गईं—
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उनका अपील का अधिकार खत्म हो जाएगा
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मौत की सजा अंतिम हो जाएगी
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आवामी लीग पर लगे प्रतिबंध को चुनौती देने का कानूनी मार्ग भी बंद हो जाएगा
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पार्टी का राजनीतिक भविष्य लगभग समाप्त माना जाएगा
अगले 30 दिन आवामी लीग और हसीना दोनों के लिए निर्णायक होंगे।
हसीना का ICT पर तीखा हमला
अपनी प्रतिक्रिया में शेख हसीना ने कहा—
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यह “फर्जी और तथाकथित अदालत” है
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यह “राजनीतिक प्रतिशोध” से प्रेरित है
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मेरी अनुपस्थिति में मुकदमा चलाया गया
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मुझे बचाव का मौका या वकील चुनने का अधिकार नहीं दिया गया
उन्होंने आरोप लगाया कि अदालत का मकसद ही आवामी लीग को राजनीतिक रूप से खत्म करना है।
International Crimes Tribunal : भारत की भूमिका और प्रत्यर्पण का दबाव
हसीना भारत में शरण लिए हुए हैं, जबकि बांग्लादेश की वर्तमान अंतरिम सरकार भारत से उन्हें प्रत्यर्पित करने की औपचारिक मांग कर चुकी है।
2013 की भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि का हवाला देते हुए ढाका ने कहा है कि यह “भारत की कानूनी बाध्यता” है।
हालांकि भारत ने अब तक प्रत्यर्पण पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी है और केवल “बांग्लादेश में शांति और स्थिरता के महत्व” की बात कही है।
राजनीतिक भविष्य पर छाया संकट
यदि हसीना आत्मसमर्पण नहीं करतीं—
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आवामी लीग का पंजीकरण रद्द होकर स्थायी प्रतिबंध लग सकता है
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पार्टी नेताओं पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई हो सकती है
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बांग्लादेश का सत्ता संतुलन पूरी तरह बदल सकता है
यदि वह आत्मसमर्पण करती हैं—
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मुकदमे का सामना करना पड़ेगा
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लेकिन राजनीतिक वापसी की एक छोटी उम्मीद बची रहेगी













