Bihar Election Result/पटना : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के ताज़ा नतीजों ने राजनीतिक जमीन को पूरी तरह हिला दिया है। सुबह 10:45 बजे तक आए रुझानों में महागठबंधन 54 सीटों पर सिमटता दिख रहा है, जबकि एनडीए 185 सीटों पर मजबूत बढ़त बनाए हुए है। इस चुनाव में सबसे बड़ा राजनीतिक झटका यह है कि तेजस्वी यादव खुद अपनी सीट पर पीछे चल रहे हैं।यानी जनता ने उन्हें सिर्फ हराया नहीं, बल्कि एक तरह से नकार दिया है।
यह नतीजे तेजस्वी के उभार और अचानक हुए पतन की कहानी बयां करते हैं—कैसे ‘युवा संभावनाओं का चेहरा’ इस बार धराशायी हो गया।
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उभरता सितारा: कैसे तेजस्वी बने युवा राजनीति का चेहरा
Bihar Election Result तेजस्वी यादव ने पिछले एक दशक में बिहार की राजनीति में मजबूत जगह बनाई।
- 2015 में डिप्टी सीएम बनकर राजनैतिक केंद्र में आए
- 2020 में 75 सीटों के साथ विपक्ष के सबसे बड़े नेता
- बेरोज़गारी पर आक्रामक राजनीति कर युवाओं का भरोसा जीता
- भीड़ जुटाने की क्षमता और सादगी भरी भाषा ने उन्हें लोकप्रिय बनाया
2024 लोकसभा चुनाव में महागठबंधन के प्रदर्शन ने तेजस्वी को और बड़ा नेता साबित किया। उनके बढ़ते कद से एक समय यह माना जाने लगा था कि 2025 उनका चुनाव है।
गलतियाँ जो भारी पड़ीं: रणनीति के कारण हुआ तेजस्वी का पतन
Bihar Election Result लेकिन 2025 के चुनाव ने दिखा दिया कि लोकप्रियता और भीड़ चुनाव जिताने के लिए काफी नहीं होते। कई रणनीतिक भूलें उनकी हार का कारण बन गईं।
1. 52 यादव उम्मीदवार—जातीय संतुलन बिगड़ा
आरजेडी ने 52 यादव प्रत्याशी उतार दिए, जो कुल उम्मीदवारों का 36% थे।
इससे यह संदेश गया कि पार्टी “यादव-प्रधान राजनीति” पर लौट आई है।
गैर-यादव पिछड़े, अति पिछड़े और सवर्ण इससे दूर हो गए।
2. सहयोगियों को कम महत्व देना
कांग्रेस और वाम दलों के साथ सीट बंटवारे में तेजस्वी के “मैं-केंद्रित” रवैये ने गठबंधन को कमजोर किया।
प्रचार में भी तेजस्वी ही मुख्य चेहरा बने रहे, जिससे महागठबंधन की संयुक्त ताकत कमजोर पड़ी।
3. बड़े वादे लेकिन कोई ब्लूप्रिंट नहीं
10 लाख नौकरियाँ, पेंशन, शराबबंदी की समीक्षा—वादे तो बड़े थे,लेकिन कैसे? कब? किस फंड से?इन सवालों का जवाब तेजस्वी कभी स्पष्ट रूप से न दे पाए। यही उनकी विश्वसनीयता पर भारी पड़ा।
4. मुस्लिमपरस्त छवि का नुकसान
Bihar Election Result बीजेपी ने महागठबंधन पर “मुस्लिमपरस्त” राजनीति का आरोप लगाया।इस नैरेटिव का असर कई यादव-dominated क्षेत्रों में भी दिखा, जहाँ वोट बंट गए।
5. लालू की विरासत को लेकर भ्रम
तेजस्वी कभी लालू की छवि अपनाते दिखे, कभी उससे बचते।
पोस्टरों में लालू को कम जगह देना, लेकिन भाषणों में ‘लालू मॉडल’ की बात करना—
यह दोहरी नीति वोटरों को समझ नहीं आई।
क्या यह तेजस्वी का अंत है?
नहीं, शायद यह नई शुरुआत का मौका हैराजनीति में उत्थान-पतन चलता रहता है।यह हार तेजस्वी के लिए बड़ा झटका जरूर है,लेकिन यह भी सच है कि बिहार में राजनीति तेज़ी से बदलती है।
यदि तेजस्वी सीखें तो
रणनीति बदलें, जातीय संतुलन सुधारे, सहयोगियों को सम्मान दें और योजनाओं का ठोस ब्लूप्रिंट पेश करें।तो वे फिर से राजनीति की मुख्य धारा में मजबूत वापसी कर सकते हैं।













