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RTI Act के 20 वर्ष! छत्तीसगढ़ में सूचना का अधिकार अधिनियम बेअसर, 1 RTI के जवाब में लग रहे 11 साल

20 Years of RTI नई दिल्ली/रायपुर: 7 नवंबर – भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और शासन व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से लागू किया गया सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम 2005 अब खुद ही संकट में दिखाई दे रहा है। देशभर में लाखों आवेदन और अपीलें वर्षों से लंबित हैं, जिससे नागरिकों को समय पर सूचना मिलना लगभग असंभव हो गया है।

पारदर्शिता का वादा अब अधूरा

आरटीआई कानून की शुरुआत इस सोच के साथ की गई थी कि जनता और सरकार के बीच भरोसे का पुल बने, और सूचना तक पहुंच आसान हो। शुरुआती दौर में इस कानून ने कई बड़े भ्रष्टाचार मामलों को उजागर किया और नागरिकों को सशक्त बनाया। लेकिन अब यह पारदर्शिता का माध्यम खुद “अप्रभावी” बनता जा रहा है।

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देशभर में 4 लाख से ज्यादा मामले लंबित

20 Years of RTI सिविल सोसाइटी संगठन ‘सतर्क नागरिक संगठन’ की रिपोर्ट “भारत में सूचना आयोगों के प्रदर्शन पर रिपोर्ट कार्ड 2024-25” के अनुसार, 30 जून 2025 तक देशभर में 4 लाख से अधिक आरटीआई मामले लंबित हैं। रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि देश के 29 सूचना आयोगों में से 6 आयोग विभिन्न अवधियों के दौरान निष्क्रिय (Defunct) रहे, जबकि झारखंड और हिमाचल प्रदेश के आयोग अब भी निष्क्रिय हैं।

छत्तीसगढ़ की स्थिति चिंताजनक

रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग (SIC) में अपीलों और शिकायतों का निपटारा बेहद धीमी गति से हो रहा है। मौजूदा गति से यदि काम चलता रहा, तो यहां एक आरटीआई आवेदन का जवाब मिलने में लगभग 11 वर्ष लग सकते हैं। यानी अगर कोई नागरिक 7 नवंबर 2025 को आवेदन देगा, तो उसे जवाब 2036 में मिलेगा।

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20 Years of RTI  इस स्थिति से स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ में आरटीआई कानून का उद्देश्य लगभग निष्प्रभावी हो चुका है। कई आवेदक वर्षों तक जवाब का इंतजार करते हैं, जबकि कुछ मामलों में सूचना अधिकारी जानबूझकर जानकारी देने में टालमटोल करते हैं।

लोकतंत्र का अहम स्तंभ कमजोर पड़ रहा

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारत में लोकतंत्र को मजबूत करने वाली ऐतिहासिक पहल थी, जिसने नागरिकों को सरकारी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने की ताकत दी। लेकिन लंबित मामले, आयोगों की निष्क्रियता और जवाबदेही की कमी अब इसके उद्देश्य को कमजोर कर रहे हैं।

अब जरूरी है सुधार और जवाबदेही

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को सूचना आयोगों में नियुक्तियों की प्रक्रिया तेज करनी चाहिए और लंबित मामलों के निपटारे के लिए विशेष अभियान चलाना चाहिए। अन्यथा, जो कानून कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार था, वह अब सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा।

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