Supreme Court On Internet Access: “बच्चों का भी मौलिक अधिकार है इंटरनेट” – नाबालिगों के डिजिटल एक्सेस पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी और ऐतिहासिक टिप्पणी

VIKASH KHALKHO

नई दिल्ली। Nishaanebaz.com-Supreme Court On Internet Access: देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान साफ कर दिया है कि इंटरनेट का इस्तेमाल हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और यह अधिकार बच्चों को भी बराबरी से हासिल है। बच्चों को इंटरनेट के उपयोग से पूरी तरह वंचित करने की मांग को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि उन्हें दोनों का ही पूर्ण अधिकार है।

सोशल मीडिया और ऑनलाइन शोषण सामग्री पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी

यह ऐतिहासिक टिप्पणी जस्टिस जे बी पारडीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने सोशल मीडिया तथा अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री (CSAM) पर चिंता जताने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए की। शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का हवाला देते हुए माना कि इंटरनेट का इस्तेमाल अभिव्यक्ति और डिजिटल पहुंच का एक अभिन्न अंग है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2020 के ‘अनुराधा भसीन’ और 2025 के ‘प्रज्ञा प्रसून’ फैसलों में भी डिजिटल पहुंच के अधिकार को मान्यता दी जा चुकी है।

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प्रतिबंध लगाने से बढ़ सकता है अनियंत्रित प्लेटफॉर्म्स का खतरा

सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूरी तरह पाबंदी लगाई गई, तो इसके उल्टा और भी घातक परिणाम हो सकते हैं। प्रतिबंध के डर से बच्चे छुपकर अनियंत्रित और असुरक्षित ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स का रुख कर सकते हैं, जहां उनके लिए खतरा और बढ़ जाएगा। इसके अलावा, किसी भी प्रकार की ऑनलाइन धमकी या प्रताड़ना की स्थिति में बच्चे डर के मारे अपने माता-पिता या अभिभावकों को बताने से भी कतराएंगे।

बेंच ने रेखांकित किया कि इंटरनेट विचारों, रचनात्मक अभिव्यक्ति और जानकारी का बहुत बड़ा माध्यम है। खासकर दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बच्चों तथा विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए यह शिक्षा और दुनिया से जुड़ने का एकमात्र सशक्त साधन हो सकता है।

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कोर्ट के महत्वपूर्ण सुझाव और केंद्र सरकार को निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई अहम सुझाव दिए हैं, जिन्हें लागू करने का तरीका केंद्र सरकार तय करेगी:

  1. उम्र आधारित सुरक्षा उपाय: बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट्स के लिए माता-पिता की सहमति (Parental Consent) और निगरानी की व्यवस्था।

  2. डिफ़ॉल्ट प्राइवेट अकाउंट: बच्चों के सोशल मीडिया प्रोफाइल डिफ़ॉल्ट रूप से प्राइवेट रखे जाएं, ताकि अनजान लोग उनसे संपर्क न कर सकें।

  3. चाइल्ड मोड और कंटेंट कंट्रोल: बच्चों को दिखाए जाने वाले विज्ञापनों और सामग्री पर सख्त नियंत्रण तथा छोटे बच्चों के लिए अलग ‘चाइल्ड मोड’ की व्यवस्था।

  4. राष्ट्रीय डेटाबेस का निर्माण: बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री की पहचान कर उसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से तुरंत हटाने के लिए एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का निर्देश।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार बच्चों को वयस्क या हानिकारक सामग्री से दूर रखने के लिए उचित और तार्किक प्रतिबंध लगा सकती है, लेकिन इंटरनेट से पूरी तरह बेदखल करना इसका समाधान नहीं है।

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विकास कुमार खलखो एक डिजिटल पत्रकार, समाचार संपादक और SEO कंटेंट क्रिएटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में एक दशक से अधिक का अनुभव है। उन्होंने BJMC, Master of Journalism (MJ) और M.Phil. (मीडिया स्टडीज़) की डिग्री हासिल की है और दबंग दुनिया, हमर छत्तीसगढ़ योजना, हरिभूमि, सन स्टार डेली न्यूज़ और छत्तीसगढ़ की आवाज़ जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है। उन्हें हिंदी पत्रकारिता, ब्रेकिंग न्यूज़ कवरेज, SEO-फ्रेंडली कंटेंट राइटिंग, डिजिटल पब्लिशिंग, कंटेंट स्ट्रैटेजी, थंबनेल डिज़ाइन और सोशल मीडिया मैनेजमेंट में विशेष महारत हासिल है। उनका उद्देश्य सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों तक प्रभावशाली समाचार पहुँचाना और साथ ही उच्च गुणवत्ता वाला डिजिटल कंटेंट तैयार करना है।
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