Divyang Quota Controversy: दिव्यांग कोटे में खेल या कागज़ी खानापूर्ति? आरटीआई में सामने आई सूची ने खड़े किए कई सवाल

Divyang Quota Controversy: गौरी शंकर गुप्ता/रायगढ़। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों ने विकासखंड शिक्षा कार्यालय घरघोड़ा में दिव्यांग कोटे से हुई नियुक्तियों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनसूचना अधिकारी द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी में ऐसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जिनसे पूरे मामले में लीपापोती और तथ्य छुपाने की आशंका जताई जा रही है। आरटीआई आवेदक को उपलब्ध कराई गई सूची में विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय घरघोड़ा के अंतर्गत दिव्यांग कोटे से नियुक्त छह अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम दिए गए हैं। सूची में किसी को दृष्टि बाधित तो अधिकांश को अस्थि बाधित बताया गया है।

सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज गायब होने से संदेह

पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आरटीआई आवेदन में स्पष्ट रूप से नियुक्ति के समय प्रस्तुत दिव्यांग प्रमाण पत्र की प्रमाणित प्रति मांगी गई थी। परंतु विभाग द्वारा वह महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध ही नहीं कराया गया। इसके परिणामस्वरूप विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर उंगलियां उठने लगी हैं। जनसूचना अधिकारी द्वारा केवल कुछ नामों की सूची उपलब्ध कराकर मूल प्रश्न को ही पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। यही कारण है कि अब लोग पूछ रहे हैं कि क्या विभाग के पास रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं या फिर प्रमाण पत्रों में कोई बड़ी गड़बड़ी है।

दो साल पहले कुछ और अब कुछ और जानकारी

सूत्रों के अनुसार इसी विषय पर पूर्व में मांगी गई जानकारी और वर्तमान आरटीआई जवाब में कई बिंदुओं पर बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। आरोप है कि पहले विभाग द्वारा जो जानकारी दी गई थी, उसमें कुछ नाम अथवा विवरण बिल्कुल अलग थे। इसके विपरीत अब विभाग द्वारा एक नई सूची प्रस्तुत की गई है। हालांकि यदि दो अलग-अलग समय में एक ही विषय पर अलग-अलग तथ्य दिए गए हैं, तो यह सीधे तौर पर आरटीआई एक्ट की पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। इसके साथ ही क्षेत्र में फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र के इस्तेमाल का एंगल भी जमकर चर्चा में आ गया है।

गलत और अधूरी जानकारी देना कानून का उल्लंघन

कानूनी जानकारों के अनुसार यदि जानबूझकर जानकारी रोकी गई या भ्रामक जवाब दिया गया हो, तो संबंधित अधिकारी पर आरटीआई एक्ट की धारा बीस के तहत कड़ी कार्रवाई संभव है। इसके अलावा आरटीआई कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि विभाग के पास रिकॉर्ड स्पष्ट हैं, तो प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध क्यों नहीं कराई गईं। इससे प्रथम दृष्टया तथ्य छुपाने और जिम्मेदार अधिकारियों को बचाने की आशंका मजबूत होती है। अंततः मामले को लेकर प्रथम अपील एवं राज्य सूचना आयोग में शिकायत की तैयारी की जा रही है।

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