बेल्जियम में गिरफ्तार हुआ मेहुल चोकसी, क्या अब भारत को सौंपा जाएगा हीरा कारोबारी?

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नई दिल्ली। पंजाब नेशनल बैंक (PNB) घोटाले के मुख्य आरोपी और भगोड़े हीरा कारोबारी मेहुल चोकसी को बेल्जियम में गिरफ्तार कर लिया गया है। सूत्रों के अनुसार, यह गिरफ्तारी भारतीय जांच एजेंसियों के अनुरोध पर 12 अप्रैल को एक स्थानीय अस्पताल से की गई, जहां वह इलाज के लिए भर्ती था। चोकसी पर करीब 13,850 करोड़ रुपये के बैंक घोटाले का आरोप है, और वह वर्ष 2018 से भारत से फरार है। पिछले कुछ वर्षों से वह कैरेबियन देश एंटीगुआ और बारबुडा में रह रहा था, जहां उसे नागरिकता भी मिल चुकी है।

सूत्रों की मानें तो भारत की प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) अब चोकसी को भारत लाने की प्रक्रिया तेज कर रही हैं। हालांकि, चोकसी के वकील बेल्जियम की अदालत में कानूनी दांव-पेंच आजमा सकते हैं, जिससे प्रत्यर्पण प्रक्रिया में कुछ समय लग सकता है। बता दें कि सितंबर 2024 में भारत ने औपचारिक रूप से बेल्जियम से चोकसी के प्रत्यर्पण का अनुरोध किया था। उस समय चोकसी के वकीलों ने दावा किया था कि वह ब्लड कैंसर से पीड़ित है और उसका स्वास्थ्य ऐसा नहीं है कि वह भारत की यात्रा कर सके। इसके जवाब में ईडी ने कोर्ट को बताया था कि अगर चोकसी इलाज के लिए एंटीगुआ से बेल्जियम की यात्रा कर सकता है, तो भारत आकर इलाज कराने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।

मेहुल चोकसी पर भारत में आर्थिक अपराधों से जुड़े कई मामले दर्ज हैं। ईडी ने उसके खिलाफ तीन चार्जशीट दाखिल की हैं और 2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट को सूचित किया था कि चोकसी एक “भगोड़ा आर्थिक अपराधी” है। चोकसी पर आरोप है कि उसने अपने भतीजे नीरव मोदी के साथ मिलकर पंजाब नेशनल बैंक को धोखे में रखकर हज़ारों करोड़ की धोखाधड़ी की। यह घोटाला भारतीय बैंकिंग इतिहास के सबसे बड़े घोटालों में से एक माना जाता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मेहुल चोकसी को भारत लाया जा सकेगा? बेल्जियम में उसकी गिरफ्तारी के बाद भारतीय एजेंसियों की कोशिशें तेज हो गई हैं, लेकिन अंतिम निर्णय बेल्जियम की अदालत पर निर्भर करेगा। यदि अदालत भारत के पक्ष में फैसला देती है, तो चोकसी को जल्द ही भारत लाया जा सकता है, जहां उसके खिलाफ लंबित मामलों में सुनवाई आगे बढ़ाई जाएगी।

भगवान गणेश को क्यों माना गया ‘प्रथम पूज्य’? जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथा

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छत्तीसगढ़। हिंदू धर्म में जब भी कोई शुभ कार्य किया जाता है—चाहे वह नया व्यवसाय शुरू करना हो, कोई वाहन खरीदना हो या गृह प्रवेश—उससे पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके पीछे की मान्यता क्या है और क्यों भगवान गणेश को ‘प्रथम पूज्य’ कहा जाता है? भगवान गणेश को हिंदू धर्म में विघ्नहर्ता और सौभाग्य के देवता माना गया है। उनकी पूजा से कार्य में आने वाली सभी रुकावटें दूर हो जाती हैं। यही कारण है कि लोग किसी भी नए काम की शुरुआत उनके नाम से करते हैं।

गणेश चतुर्थी के मौके पर देशभर में भगवान गणेश की भव्य पूजा होती है। लेकिन यह केवल एक पर्व तक सीमित नहीं है। भगवान गणेश उन गिने-चुने देवताओं में से हैं, जिनकी पूजा प्रतिदिन, विशेष अवसरों और सभी धार्मिक अनुष्ठानों में पहले की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार सभी देवी-देवताओं के बीच इस बात को लेकर विवाद हुआ कि सबसे पहले पूजा किसकी की जानी चाहिए। इस विवाद का समाधान निकालने के लिए नारद मुनि ने सभी को भगवान शिव के पास भेजा। भगवान शिव ने सभी देवताओं के सामने एक प्रतियोगिता रखी—जिसमें सभी को अपने-अपने वाहन पर बैठकर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करनी थी। जो सबसे पहले लौटेगा, उसे ‘प्रथम पूज्य’ का स्थान मिलेगा।

जहां सभी देवता अपने तेज गति वाले वाहनों पर सवार होकर निकल पड़े, वहीं भगवान गणेश अपनी सवारी चूहे को देखकर चिंतित हो उठे। लेकिन उन्होंने बुद्धिमत्ता से काम लिया। उन्होंने ब्रह्मांड की जगह अपने माता-पिता—भगवान शिव और माता पार्वती—की सात बार परिक्रमा की और उन्हें ही अपना सम्पूर्ण ब्रह्मांड मान लिया। जब सभी देवता अपनी यात्रा समाप्त कर लौटे, तो उन्होंने देखा कि गणेश जी पहले से ही वहां उपस्थित हैं। यह देख सभी आश्चर्यचकित रह गए।

भगवान शिव ने गणेश जी की इस समझदारी और भक्ति को देखते हुए उन्हें विजेता घोषित किया और कहा कि माता-पिता की परिक्रमा करना ब्रह्मांड की परिक्रमा के समान है। तभी से यह परंपरा बन गई कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से की जाती है।

भगवान गणेश न केवल विघ्नों को दूर करने वाले हैं, बल्कि उन्होंने यह भी सिखाया कि किसी भी कार्य में केवल शक्ति नहीं, बल्कि बुद्धि और भक्ति से भी विजय प्राप्त की जा सकती है। यही कारण है कि आज भी हर शुभ कार्य की शुरुआत उनके स्मरण और पूजा से की जाती है।

बॉडी बिल्डिंग की शुरुआत कर रहे हैं? इन आम गलतियों से बचें और बनाएं मसल्स सुरक्षित तरीके से

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Health: आजकल युवाओं में फिट बॉडी और मसल्स बनाने का जबरदस्त क्रेज देखने को मिल रहा है। जिम जॉइन करते ही हर कोई जल्दी-जल्दी रिजल्ट चाहता है, लेकिन शुरुआती दौर में की गई कुछ गलतियां आगे चलकर शरीर को नुकसान पहुंचा सकती हैं। ऐसे में अगर आप मसल्स बिल्डिंग की शुरुआत कर रहे हैं, तो कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखकर न सिर्फ बेहतर रिजल्ट पा सकते हैं, बल्कि खुद को इंजरी से भी बचा सकते हैं।

1. सही फॉर्म और टेक्नीक है सबसे जरूरी

फिटनेस की दुनिया में एक बात हमेशा याद रखें – फॉर्म पहले, वजन बाद में। शुरुआत में हल्के वजन से एक्सरसाइज करना शुरू करें और धीरे-धीरे वजन बढ़ाएं। सही तकनीक अपनाकर एक्सरसाइज करने से मसल्स बेहतर तरीके से विकसित होते हैं और शरीर चोट से भी बचा रहता है।

2. जल्दी हैवी लिफ्टिंग करना न बनाएं लक्ष्य

बहुत से लोग शुरुआत में ही भारी वजन उठाने की कोशिश करते हैं, जो गलत है। आपका शरीर धीरे-धीरे ट्रेनिंग के लिए तैयार होता है। हैवी लिफ्टिंग की जल्दबाज़ी से मसल्स पर बेवजह दबाव पड़ता है और चोट लगने का खतरा बढ़ जाता है।

3. वैल-राउंडेड रूटीन बनाएं

एक अच्छी फिटनेस रूटीन में सभी मसल ग्रुप्स को शामिल करना चाहिए। बैलेंस और सिमेट्री पर ध्यान दें। पूरे शरीर के लिए एक संतुलित वर्कआउट प्लान अपनाएं जिससे ओवरऑल डेवलपमेंट हो और किसी एक हिस्से पर ज्यादा दबाव न पड़े।

4. रिकवरी को दें पूरा समय

मसल्स वर्कआउट के दौरान नहीं, बल्कि रेस्ट के समय ग्रो करते हैं। इसलिए अपनी ट्रेनिंग में रेस्ट डेज जरूर रखें। इससे मसल्स को रिकवर और रीबिल्ड होने का समय मिलता है, जिससे आगे चलकर स्ट्रेंथ में सुधार होता है।

5. डाइट है आपकी दूसरी जिम

बॉडी बनानी है तो सही पोषण लेना भी उतना ही जरूरी है जितना कि वर्कआउट करना। डाइट में भरपूर प्रोटीन, कॉम्प्लेक्स कार्ब्स और हेल्दी फैट्स शामिल करें। इसके साथ ही पानी खूब पिएं – हाइड्रेशन से मसल्स की रिकवरी बेहतर होती है।

6. शरीर के सिग्नल को समझें

अगर थकान ज्यादा लग रही है या मसल्स में असामान्य दर्द हो रहा है, तो इसे नजरअंदाज न करें। ऐसे समय में वर्कआउट जारी रखना नुकसानदेह हो सकता है। शरीर को सुनना और उसी के अनुसार ट्रेनिंग शेड्यूल बनाना समझदारी है।

7. वर्कआउट के बाद कूल डाउन करना न भूलें

वर्कआउट खत्म करने के बाद कुछ समय कूल डाउन और स्ट्रेचिंग को जरूर दें। इससे मसल्स रिलैक्स होते हैं और चोट लगने का खतरा कम हो जाता है। बॉडी बिल्डिंग सिर्फ वेट उठाने का खेल नहीं है, बल्कि यह एक साइंटिफिक और अनुशासित प्रक्रिया है। अगर आप सही टेक्नीक, संतुलित डाइट और भरपूर रेस्ट के साथ ट्रेनिंग करते हैं, तो मसल्स बनाना न सिर्फ आसान होगा, बल्कि सेफ भी रहेगा।

महात्मा ज्योतिबा फुले: एक समाज सुधारक, शिक्षाविद् और न्याय की आवाज़

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Mahatma Jyotirao Phule: 19वीं सदी का भारत सामाजिक असमानता और जातीय भेदभाव के अंधकार में डूबा हुआ था। इसी अंधकार में एक प्रकाश पुंज बनकर उभरे महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले—एक ऐसे विचारक, जो न केवल विचारों से समाज को झकझोरने का माद्दा रखते थे, बल्कि अपनी क्रांतिकारी सोच और कर्म के बल पर भारत की सामाजिक संरचना को हिलाकर रख दिया।

11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में जन्मे ज्योतिराव फुले का जीवन प्रारंभ से ही संघर्षों से भरा रहा। वे ‘माली’ जाति से थे, जिसे तत्कालीन समाज में निम्न समझा जाता था। उनके पिता, गोविंदराव फुले, पुणे में फूल बेचने का काम करते थे, और यही वजह थी कि परिवार ने ‘फुले’ उपनाम को अपनाया। ज्योतिराव की माँ का देहांत उस समय हो गया जब वे केवल नौ महीने के थे।

गरीबी के चलते उन्होंने बाल्यकाल में ही पढ़ाई छोड़कर खेतों में काम करना शुरू कर दिया। लेकिन एक पड़ोसी की जागरूकता और उत्साहवर्धन के कारण वे दोबारा स्कूल लौटे और 1841 में स्कॉटिश मिशन स्कूल, पुणे में दाखिला लिया। 1847 तक उन्होंने वहाँ से शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई के दौरान ही उनकी मुलाकात सदाशिव बल्लाल गोवंडे से हुई, जो जीवनभर उनके मित्र और सहयोगी बने रहे।

सिर्फ 13 वर्ष की आयु में ज्योतिबा का विवाह सावित्रीबाई से हुआ—जो आगे चलकर न केवल उनकी जीवन संगिनी बनीं, बल्कि उनके सामाजिक आंदोलन की सबसे मजबूत साथी भी रहीं।

ज्योतिबा फुले को जब यह महसूस हुआ कि भारतीय समाज में महिलाएं, विशेषकर दलित और पिछड़ी जातियों की महिलाएं शिक्षा से वंचित हैं, तो उन्होंने सबसे पहले इस दिशा में काम करना शुरू किया। उन्होंने 1848 में भारत का पहला बालिका विद्यालय पुणे में खोला। अपनी पत्नी सावित्रीबाई को शिक्षिका के रूप में तैयार किया—उन्होंने उन्हें खुद पढ़ाया, लिखना सिखाया और समाज की रूढ़ियों को तोड़ते हुए उन्हें स्कूल में शिक्षिका बनाया।

धीरे-धीरे उन्होंने महिलाओं के लिए कई स्कूल खोले और दलित बच्चों के लिए भी विशेष विद्यालय की स्थापना की। यही नहीं, उन दिनों विधवाओं की स्थिति बेहद दयनीय थी। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और बाल विवाह के खिलाफ आवाज़ बुलंद की।

1873 में ज्योतिबा फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की। यह संस्था जातीय भेदभाव, धार्मिक पाखंड और समाज में व्याप्त अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं के खिलाफ खड़ी हुई। इस संगठन का उद्देश्य समाज के हाशिए पर खड़े वर्गों—दलितों, महिलाओं, किसानों—को एकजुट करना और उन्हें आत्मसम्मान, शिक्षा और समानता का अधिकार दिलाना था।

महात्मा फुले केवल एक समाजसेवी ही नहीं, बल्कि एक विचारक और लेखक भी थे। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना गुलामगिरी (1873) थी, जिसमें उन्होंने जाति व्यवस्था की कुरीतियों पर करारा प्रहार किया। इसके अलावा उन्होंने कई पुस्तिकाएं और लेख लिखे, जो आज भी सामाजिक सुधार की दिशा में मील का पत्थर माने जाते हैं।

ज्योतिबा फुले ने केवल सामाजिक स्तर पर ही काम नहीं किया, बल्कि वे प्रशासनिक क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। वे 1876 से 1883 तक पुणे नगर पालिका के आयुक्त रहे। इस दौरान उन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और शिक्षा के क्षेत्र में कई उल्लेखनीय कार्य किए।

1888 में उन्हें स्ट्रोक आया, जिसके कारण वे आंशिक रूप से पक्षाघात का शिकार हो गए। 28 नवंबर 1890 को, 63 वर्ष की आयु में, समाज का यह महान सपूत इस दुनिया से विदा हो गया—but his legacy lives on.

ज्योतिबा फुले के योगदान की झलक
भारत में महिलाओं के लिए पहला स्कूल स्थापित किया।

दलितों और पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा का आंदोलन चलाया।

विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह निषेध और छुआछूत के खिलाफ आंदोलन किया।

सत्यशोधक समाज के माध्यम से सामाजिक न्याय की अलख जगाई।

गुलामगिरी जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। महात्मा ज्योतिबा फुले का जीवन संघर्ष, सेवा और सामाजिक बदलाव का प्रतीक है। उन्होंने भारत की जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी और शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार बनाया। आज जब हम सामाजिक समानता, महिला अधिकार और शिक्षा की बात करते हैं, तो यह समझना आवश्यक है कि उस नींव को रखने वाले महापुरुषों में सबसे अग्रणी नाम महात्मा ज्योतिबा फुले का ही है।

एसिडिटी से राहत के लिए आज़माएं ये आसान घरेलू उपाय, खानपान और आदतों में लाएं बदलाव

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Health Care : तेज़ मिर्च-मसालों वाला खाना, भागदौड़ भरी दिनचर्या और तनाव भरा जीवन — ये सब कुछ आज की आम ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन इसके साथ ही एक समस्या भी आम होती जा रही है, एसिडिटी पेट में जलन, सीने में दर्द, खट्टी डकारें और भारीपन, ये सब लक्षण हैं पेट में बनने वाले अम्ल (एसिड) के असंतुलन के, जिसे आमतौर पर हार्टबर्न या एसिड रिफ्लक्स कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या कई वजहों से हो सकती है, खराब खानपान से लेकर गलत दिनचर्या तक।

एसिडिटी होने के प्रमुख कारण:
मसालेदार और तला-भुना भोजन: अत्यधिक तीखा, तैलीय या हैवी खाना एसिड का स्तर बढ़ा देता है।

खाने के तुरंत बाद लेटना: भोजन के बाद शरीर को आराम देने के बजाय लेटना या झुकना एसिड को ऊपर की ओर धकेल सकता है।

तनाव और मानसिक दबाव: लगातार चिंता या स्ट्रेस से शरीर में एसिड का स्तर असामान्य रूप से बढ़ सकता है।

अनियमित जीवनशैली: देर रात तक जागना, नींद की कमी और शारीरिक गतिविधि में कमी भी इसका बड़ा कारण है।

अधिक वजन या मोटापा: शरीर का भार बढ़ने से पेट पर दबाव बढ़ता है, जिससे एसिड ऊपर चढ़ सकता है।

एसिडिटी से राहत के लिए ज़रूरी बदलाव:
संतुलित आहार अपनाएं: खाने में हल्के, कम मिर्च-मसाले वाले और सुपाच्य आहार को जगह दें। ऑयली फूड, चॉकलेट, कैफीन और अल्कोहल से बचें।

भोजन के बाद तुरंत न लेटें: खाना खाने के कम से कम 30 मिनट बाद ही आराम करें या सोएं। भोजन के बाद 5–10 मिनट की धीमी टहल जरूरी है।

पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं: दिनभर में 7–8 गिलास पानी पीने से पेट ठंडा रहता है और एसिड कम बनता है।

आसान घरेलू नुस्खे जो दिलाएं राहत:
अदरक: अदरक में प्राकृतिक एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं। इसका छोटा टुकड़ा चबाएं या अदरक की चाय पीना फायदेमंद हो सकता है।

सौंफ: भोजन के बाद सौंफ चबाना न सिर्फ पाचन में मदद करता है, बल्कि गैस और एसिडिटी से भी राहत दिलाता है।

बेकिंग सोडा: एक गिलास पानी में आधा चम्मच बेकिंग सोडा मिलाकर पीने से पेट का एसिड न्यूट्रल होता है और जलन कम होती है।

वजन पर रखें नियंत्रण:
एसिडिटी की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए वजन को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है। मोटापा एसिड को ऊपर की ओर भेजने में एक बड़ा कारण बन सकता है।

क्या करें जब घरेलू उपाय काम न करें?
अगर उपरोक्त उपायों के बावजूद एसिडिटी की समस्या बार-बार हो रही हो, जलन ज्यादा महसूस हो रही हो या नींद तक बाधित हो रही हो, तो डॉक्टर से परामर्श लेना ज़रूरी है।
लंबे समय तक अनदेखी करने पर यह समस्या गैस्ट्रिक अल्सर या एसोफैगस की बीमारी का रूप भी ले सकती है। एसिडिटी कोई गंभीर बीमारी नहीं, लेकिन अगर इसे समय रहते नियंत्रित न किया जाए तो ये जीवन की गुणवत्ता पर असर डाल सकती है। ऐसे में जरूरी है कि खानपान, जीवनशैली और कुछ छोटे घरेलू उपायों को अपनाकर इससे राहत पाई जाए।

The Importance of Reliable News Websites in Today’s Media Landscape

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पद्म पुरस्कार : चुपचाप इतिहास गढ़ने वालों की गूँज

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कुछ लोग प्रचार में नहीं होते, फिर भी प्रेरणा बन जाते हैं। हर साल जब गणतंत्र दिवस आता है, हम परेड, झंडा, भाषण और वीरता पदक के बारे में बातें करते हैं। लेकिन एक और चीज़ है जो हर साल quietly घोषित होती है, पर उसकी गूंज वर्षों तक सुनाई देती है — पद्म पुरस्कार। ये सिर्फ पुरस्कार नहीं हैं — ये उस भारत की तस्वीर हैं, जो अखबारों में नहीं दिखता, टीवी स्क्रीन पर नहीं चमकता, लेकिन देश की आत्मा में गहराई तक बसा होता है।

भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले ये नागरिक सम्मान तीन श्रेणियों में आते हैं — पद्म विभूषण, पद्म भूषण, और पद्मश्री
इनका आरंभ 1954 में हुआ था, और तब से हर साल ये उन लोगों को दिए जाते हैं जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में “असाधारण योगदान” दिया हो। यह कोई प्रतियोगिता नहीं, कोई क्विज़ शो नहीं, और न ही कोई टिकट टू फेम है। यह पुरस्कार उन लोगों के लिए हैं जिनकी कहानी कोई और नहीं कहता — तो देश खुद उन्हें चुनकर कहता है, “हमने तुम्हें देखा है। हम जानते हैं तुम कौन हो।”

2025 में कुल 139 लोगों को पद्म पुरस्कार दिए गए हैं —

  • 7 को पद्म विभूषण

  • 19 को पद्म भूषण

  • 113 को पद्मश्री

इनमें से कई नाम बेहद चर्चित हैं — लेकिन इस बार की सबसे खूबसूरत बात ये रही कि 30 गुमनाम नायकों को सम्मान मिला। ये वो लोग हैं जो गांवों के स्कूलों में पढ़ाते रहे, जंगलों में आदिवासियों के लिए काम करते रहे, शास्त्रीय रागों को जिंदा रखते रहे — और कभी खुद को महान नहीं माना।

क्या मिलती है कोई इनामी राशि या सुविधा?

बहुतों को लगता है कि शायद इस सम्मान के साथ पैसा भी मिलता होगा, या फिर सरकार से कोई सुविधा।
सच्चाई यह है — पद्म पुरस्कार पूरी तरह “अमूर्त” हैं।

  • कोई पैसे नहीं मिलते।

  • न ही मुफ्त एयर टिकट, रेलवे पास या कोई VIP ट्रीटमेंट।

  • मिलती है तो सिर्फ सम्मान की मुहर, और एक ऐसा मेडल जो जीवनभर की साधना का प्रतीक होता है।

राष्ट्रपति के हाथों दिया गया ये पदक उस पल को अमर बना देता है।

कैसे चुने जाते हैं पद्म पुरस्कार विजेता?

सरकार हर साल एक ओपन पोर्टल के ज़रिए नामांकन मांगती है।

  • कोई भी व्यक्ति खुद को नामांकित कर सकता है।

  • कोई सांसद, विधायक, NGO, यहां तक कि आम नागरिक भी किसी का नाम भेज सकता है।

एक उच्चस्तरीय समिति हर नाम की पृष्ठभूमि की जांच करती है — क्या उसका योगदान किसी एक क्षेत्र में वाकई असाधारण है? क्या उसका कार्य प्रभावी, स्थायी और स्वार्थहीन रहा है?

और फिर शुरू होता है गुमनाम से महान बनने की यात्रा

पद्मश्री के चमकते सितारे

  • अरिजीत सिंह — वो आवाज़ जो दिलों के तार छेड़ती है। कोई म्यूजिक रियलिटी शो का प्रोडक्ट नहीं, बल्कि एक साधक जिसने सुरों को साधा।

  • बुधेन्द्र जैन — विज्ञान में अद्वितीय योगदान देने वाले, जिनका नाम शायद आपने कभी नहीं सुना, लेकिन जिन्होंने भारत की साइंटिफिक दुनिया को नई दिशा दी।

  • बेगम बतूल — वो महिला जिन्होंने वर्षों तक समाज में बदलाव की लौ जलाई, बिना किसी समर्थन या कैमरे के।

  • आर अश्विन — क्रिकेट का वह बौद्धिक चेहरा, जिसने बल्ले और गेंद दोनों से खेल को नया आयाम दिया।

पद्म भूषण के प्रेरणादायक चेहरे

  • शेखर कपूर — भारतीय और वैश्विक सिनेमा को जोड़ने वाले विज़नरी निर्देशक।

  • साध्वी ऋतंभरा — सामाजिक क्षेत्र में महिलाओं और बालिकाओं के सशक्तिकरण का प्रतीक चेहरा।

  • पंकज उधास (मरणोपरांत) — वो आवाज़ जो दशकों तक ग़ज़ल के सुरों को जीवित रखे रही।

पद्म विभूषण के उच्चतम सम्मान

  • जस्टिस जेएस खेहर — न्यायपालिका के निष्पक्ष और स्वतंत्र स्तंभ।

  • लक्ष्मीनारायण सुब्रमण्यम — जिन्होंने वायलिन को साधना नहीं, इबादत बनाया।

  • एमटी वासुदेवन नायर (मरणोपरांत) — जिनकी कहानियाँ मलयालम साहित्य की आत्मा हैं।

ये सिर्फ पुरस्कार नहीं हैं… ये प्रेरणाएँ हैं

हर बार जब हम पद्म पुरस्कारों की सूची पढ़ते हैं, हम सिर्फ नाम नहीं पढ़ रहे होते – हम एक-एक प्रेरणा को देख रहे होते हैं। हर नाम के पीछे संघर्ष, साधना और समर्पण की एक कहानी होती है।  ये हमें याद दिलाते हैं – “नाम बड़ा होना ज़रूरी नहीं, काम बड़ा होना चाहिए।”

एक सवाल जो हर युवा को खुद से पूछना चाहिए

“क्या मेरा काम ऐसा है, कि अगर मैं गुमनाम रहूं फिर भी देश मुझे एक दिन पहचाने?”

अगर जवाब हां है — तो एक दिन, हो सकता है अगली पद्म पुरस्कार सूची में आपका नाम हो। पद्म पुरस्कार 2025 की सूची हमें यह समझाती है कि भारत सिर्फ IT, क्रिकेट और बॉलीवुड का देश नहीं है। यह देश उन लाखों लोगों का भी है जो चुपचाप बदलाव ला रहे हैं।

तो अगली बार जब कोई पूछे — “हीरो कौन है?” तो उन्हें ये सूची दिखाइए। क्योंकि असली हीरो वही हैं, जिनका नाम कोई नहीं जानता — पर जिनका काम सब महसूस करते हैं।

“एक शांत विजेता – रतन टाटा की कहानी” उस आदमी की दास्तान जिसने भारत को दुनिया के सामने झुका नहीं, खड़ा किया।

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Entertainment: कभी-कभी कोई व्यक्ति ऐसा होता है जो ना चीखता है, ना शोर करता है, ना खुद की पीठ थपथपाता है… फिर भी उसके काम इतने ऊँचे होते हैं कि पूरी दुनिया उसकी तरफ देखने लगती है। रतन टाटा ऐसे ही इंसान हैं। एक ऐसा नाम, जो सफलता की परिभाषा नहीं, बल्कि उसका स्तर है।

29 दिसंबर 1937, मुंबई। एक पारसी परिवार में जन्मा एक मासूम बच्चा जिसे किसी ने नहीं बताया कि वह बड़ा होकर एक दिन टाटा समूह का चेहरा बन जाएगा। 10 साल की उम्र में माँ-बाप का अलग हो जाना, फिर दादी के साथ पला-बढ़ा – यह सब कठिन जरूर था, लेकिन यही नेत्रत्व की पहली सीढ़ियाँ बनीं। रतन टाटा ने Cornell University से आर्किटेक्चर पढ़ा, और बाद में Harvard Business School से मैनेजमेंट। लेकिन उनके लिए डिग्री से ज्यादा ज़रूरी था जमीन से जुड़ाव

रतन टाटा जब टाटा समूह में लौटे, तो कोई विशेष पद नहीं मिला। उन्हें टाटा स्टील के प्लांट में भेजा गया – जहाँ उन्हें हेलमेट पहनकर कामगारों के बीच काम करना होता था। शायद वहीं उन्होंने सीखा कि लीडर वो नहीं जो ऑफिस में बैठकर ऑर्डर देता है, लीडर वो है जो लोगों के साथ मिलकर मिट्टी से सपनों की इमारत बनाता है।

1991 में जब उन्होंने टाटा समूह की बागडोर संभाली, तो बहुत से आलोचकों ने कहा – “यह नहीं संभाल पाएंगे।” लेकिन उन्होंने जवाब अपनी चुप्पी से दिया… और काम से साबित किया कि वे सिर्फ योग्य ही नहीं, अद्वितीय हैं। उन्होंने टाटा टी, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस (TCS) जैसी कंपनियों को एक नई दिशा दी।

2008 में, उन्होंने Nano कार दुनिया को दिखाई — एक कार जो सिर्फ़ 1 लाख रुपये में आम आदमी का सपना पूरा कर रही थी। लोगों ने इसका मज़ाक उड़ाया, पर रतन टाटा मुस्कुराए और कहा — “मैं सिर्फ़ उस पिता के लिए ये कार बना रहा हूँ जो अपनी पत्नी और बच्चों को स्कूटर पर बैठाकर ले जाता है।” यह महज़ कार नहीं थी, यह करुणा से जन्मा एक आइडिया था।

जब टाटा मोटर्स ने जगुआर और लैंड रोवर जैसी लग्ज़री ब्रिटिश कंपनियों को खरीदा, दुनिया चौंकी। ये वही कंपनियाँ थीं जिन्हें पहले टाटा को बेचने से मना कर दिया गया था। लेकिन रतन टाटा ने बदला नहीं लिया, बल्कि सम्मान से जवाब दिया — और दुनिया ने भारतीय नेतृत्व को नए नज़रों से देखना शुरू किया।

रतन टाटा केवल उद्योगपति नहीं हैं, वो एक विचार हैं। उन्होंने कभी शादी नहीं की, लेकिन पूरे देश को अपना परिवार समझा। टाटा ट्रस्ट्स के ज़रिए उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास में अरबों रुपये दान किए।

उन्हें खुद प्रचार पसंद नहीं है, लेकिन उनका हर कदम प्रेरणा देता है।

पुरस्कार और सम्मान

  • पद्म भूषण (2000)

  • पद्म विभूषण (2008)

  • मानद डॉक्टरेट्स – दुनिया की कई प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज़ से

  • साइलेंट हीरो अवॉर्ड – लोगों के दिलों में

 

रतन टाटा का निधन: एक युग का अंत

रतन नवल टाटा, भारत के प्रतिष्ठित उद्योगपति और टाटा समूह के मानद चेयरमैन, का 9 अक्टूबर 2024 की रात 11:39 बजे मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्हें ब्रीच कैंडी अस्पताल के ICU में भर्ती किया गया था, जहाँ उनका इलाज चल रहा था। डॉक्टरों के अनुसार, उम्र संबंधी बीमारियों और लो ब्लड प्रेशर के कारण उनकी स्थिति गंभीर हो गई थी। उनके पार्थिव शरीर को मुंबई के नरीमन पॉइंट स्थित नेशनल सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स (NCPA) में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया, जहाँ हजारों लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। शाम 4 बजे उनका अंतिम संस्कार वर्ली श्मशान घाट पर राजकीय सम्मान के साथ किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, और उद्योग जगत के कई प्रमुख हस्तियों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें “दयालु आत्मा और असाधारण इंसान” बताया।

रतन टाटा न केवल एक सफल उद्योगपति थे, बल्कि एक महान मानवतावादी भी थे। उनका जीवन और कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा। रतन टाटा ने कभी भाषणों में देशभक्ति नहीं दिखाई, लेकिन उनके हर निर्णय में देश सबसे ऊपर रहा। वो बोलते कम हैं, सुनते ज़्यादा। दिखावा नहीं करते, योगदान करते हैं। और यही उन्हें एक सच्चा ‘रतन’ बनाता है — भारत के लिए, और हर उस युवा के लिए जो बड़ा सपना देखता है।

“मैं व्यवसाय को पैसे कमाने के ज़रिए नहीं, बदलाव लाने के ज़रिए देखता हूँ।” – रतन टाटा 

सावित्रीबाई फुले: भारत की पहली महिला शिक्षिका और सामाजिक क्रांति की अगुआ

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“अगर आप शिक्षा चाहते हैं, तो इसके लिए संघर्ष करना होगा।”
ये शब्द नहीं, बल्कि जीवन का संदेश थीं सावित्रीबाई फुले, जो भारत की पहली महिला शिक्षिका ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और महिला सशक्तिकरण की प्रतीक थीं। सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव गांव में हुआ था। एक गरीब किसान परिवार में जन्मी सावित्रीबाई की शिक्षा की कोई संभावना नहीं थी। मात्र 9 वर्ष की उम्र में उनका विवाह 13 वर्षीय ज्योतिराव फुले से हुआ। पर यह विवाह उनके जीवन में एक नई दिशा लेकर आया। ज्योतिराव फुले स्वयं सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्षरत थे। उन्होंने सावित्रीबाई को पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर दिया। इसके बाद सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणे से औपचारिक शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने अपनी मेहनत, लगन और साहस से खुद को शिक्षिका के रूप में स्थापित किया — वो भी ऐसे समय में, जब महिलाओं का पढ़ना पाप समझा जाता था।

भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं सावित्रीबाई

सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पुणे में एक बालिका विद्यालय की स्थापना की। यह भारत का पहला गर्ल्स स्कूल माना जाता है। उस समय जब महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैद माना जाता था, सावित्रीबाई ने शिक्षा के माध्यम से उनके जीवन में उजाला लाने का कार्य शुरू किया।

विद्यालय चलाना आसान नहीं था। उन्हें प्रतिदिन अपमान, गालियों और हिंसा का सामना करना पड़ता था। समाज के ठेकेदार उनके कपड़ों पर कीचड़ फेंकते, अपशब्द बोलते, लेकिन वह कभी नहीं रुकीं। वे हमेशा अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी और पानी लेकर जाती थीं, ताकि गंदे कपड़े बदल सकें और शिक्षा का कार्य चलता रहे। उनके इस साहसिक प्रयास ने हजारों लड़कियों को शिक्षा की रोशनी से जोड़ा।

सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध युद्ध

सावित्रीबाई का जीवन सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं था। वे समाज में फैली अनेकों बुराइयों के खिलाफ लड़ने वाली एक योद्धा थीं।

विधवा उत्पीड़न का विरोध: उन्हें यह देखकर अत्यंत दुःख होता था कि विधवाओं का सिर मुंडवाया जाता है, उन्हें अपवित्र माना जाता है। उन्होंने नाइयों से आग्रह किया कि वे विधवाओं के बाल काटना बंद करें। यह कदम तत्कालीन समाज में क्रांतिकारी माना गया।

विधवा पुनर्विवाह को समर्थन: उन्होंने युवा विधवाओं के पुनर्विवाह को समर्थन दिया और कई जोड़ों की शादी ‘सत्यशोधक समाज’ के माध्यम से करवाई।

दलितों और पिछड़ों के अधिकार: वे मानती थीं कि हर इंसान समान है। उन्होंने दलितों के लिए स्कूल खोले, उन्हें सार्वजनिक कुएं से पानी न मिलने की समस्या का समाधान करने के लिए अपने घर में एक कुआं खुदवाया, जिससे सभी को पानी मिल सके।

सावित्रीबाई एक उत्कृष्ट कवयित्री भी थीं। उन्होंने अपनी कविताओं और लेखों के माध्यम से शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय का प्रचार किया। उनकी रचनाओं में जीवन की पीड़ा, समाज की कड़वी सच्चाइयाँ और बदलाव की पुकार साफ दिखती है।
उनकी प्रमुख पुस्तकों में “काव्य फुले” और “बावन्न खून” शामिल हैं, जो आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं।

1875 से 1877 के बीच महाराष्ट्र में जबरदस्त अकाल पड़ा। हजारों लोग भूख से मरने लगे। इस संकट के समय सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने सत्यशोधक समाज की मदद से राहत कार्य शुरू किए। उन्होंने भूखों को भोजन, बीमारों को चिकित्सा और बेसहारा लोगों को सहारा दिया।

1896 में जब महाराष्ट्र एक बार फिर अकाल और प्लेग की चपेट में आया, सावित्रीबाई ने फिर अपनी जान की परवाह किए बिना लोगों की सेवा शुरू की। जब उन्हें पता चला कि उनके मित्र का बेटा प्लेग से पीड़ित है, तो वह स्वयं उसे अपनी पीठ पर उठाकर डॉक्टर के पास ले गईं। इस दौरान वह खुद प्लेग से संक्रमित हो गईं। और अंततः 10 मार्च 1897 को उनकी मृत्यु हो गई — सेवा करते हुए, इंसानियत निभाते हुए।

सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने मिलकर सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य जातिवाद, पितृसत्ता और धार्मिक पाखंड के खिलाफ लड़ना था। इस समाज ने दहेज रहित विवाहों को बढ़ावा दिया, बिना पंडित के शादियां करवाईं और दलितों को समान अधिकार दिलाने का अभियान चलाया।

आज सावित्रीबाई फुले को सिर्फ एक शिक्षिका के रूप में नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने जिस समाज की कल्पना की थी — जिसमें सभी समान हों, स्त्रियों को सम्मान मिले, और शिक्षा सबका अधिकार हो — वह आज भी हमारे लिए प्रेरणा है। सावित्रीबाई फुले नारी चेतना की प्रतीक थीं। उन्होंने समाज के हर उस व्यक्ति के लिए लड़ाई लड़ी जिसे हाशिये पर रखा गया था — स्त्रियाँ, दलित, गरीब, विधवाएँ, बच्चे। उन्होंने न केवल इतिहास रचा, बल्कि समाज को उसका सही रास्ता भी दिखाया। उनकी जिंदगी एक मिशन थी — शिक्षा का, समानता का, और बदलाव का। और वह मिशन आज भी अधूरा है… जब तक हर बच्चा स्कूल नहीं जाता, जब तक हर स्त्री को सम्मान नहीं मिलता, जब तक जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव होता है — सावित्रीबाई की मशाल को जलाए रखना होगा।

नाश्ते में ओट्स खाना बन सकता है सेहतमंद दिन की शुरुआत, वजन घटाने और स्किन हेल्थ के लिए बेहद फायदेमंद

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Health Care : तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में लोग हेल्दी डाइट की तलाश में अक्सर उलझ जाते हैं। लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि दिन की शुरुआत अगर सही हो, तो बाकी दिन भी बेहतर बनता है। ऐसे में सुबह के नाश्ते में ओट्स को शामिल करना न केवल आसान विकल्प है, बल्कि यह स्वास्थ्य के कई मोर्चों पर फायदेमंद भी साबित हो सकता है।

ओट्स क्यों बनता है परफेक्ट ब्रेकफास्ट ऑप्शन?
फाइबर और प्रोटीन का बेहतर स्रोत: ओट्स में भरपूर मात्रा में डायटरी फाइबर, प्रोटीन और कई जरूरी विटामिन्स होते हैं, जो पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराते हैं।

पाचन तंत्र की सफाई: ओट्स का नियमित सेवन आंतों को साफ़ करता है। इससे कब्ज, गैस और अपच जैसी समस्याओं में राहत मिलती है।

दिल की सेहत में सहायक:
विशेषज्ञ बताते हैं कि ओट्स का सेवन कोलेस्ट्रॉल लेवल को नियंत्रित करता है। इसमें मौजूद बीटा ग्लूकन नामक फाइबर एलडीएल (बुरा कोलेस्ट्रॉल) को कम करने में मदद करता है। यह हृदय रोगों के खतरे को कम करने की दिशा में एक सरल लेकिन असरदार उपाय माना जाता है।

डायबिटीज के रोगियों के लिए वरदान:
ओट्स का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, यानी यह शरीर में धीरे-धीरे शुगर रिलीज करता है। इससे ब्लड शुगर तेजी से नहीं बढ़ता और डायबिटीज के मरीजों को काफी लाभ पहुंचता है। साथ ही, ओट्स में मौजूद फाइबर और जटिल कार्बोहाइड्रेट शरीर में ग्लूकोज के अवशोषण की प्रक्रिया को धीमा कर देते हैं।

त्वचा के लिए भी फायदेमंद:
ओट्स न केवल अंदरूनी सेहत के लिए, बल्कि स्किन हेल्थ के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। नियमित सेवन से चेहरे पर सूजन, रैशेज और खुजली जैसी समस्याओं में राहत मिल सकती है। ओट्स में मौजूद एंटीऑक्सिडेंट्स और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण स्किन को साफ और चमकदार बनाए रखने में मदद करते हैं।

ओट्स खाने के स्वादिष्ट और आसान तरीके:
ओट्स को नाश्ते में शामिल करने के लिए सिर्फ दूध में उबालना ही विकल्प नहीं है। आप इसे कई स्वादिष्ट तरीकों से भी तैयार कर सकते हैं:

ओट्स चीला: बेसन या दही मिलाकर हेल्दी पैनकेक जैसा बनाएं।

ओट्स खिचड़ी: सब्जियों के साथ मिलाकर नमकीन खिचड़ी का रूप दें।

ओट्स डोसा या इडली: साउथ इंडियन फ्लेवर में हेल्दी ट्विस्ट लाएं।

ओट्स बाउल: दही, फलों, नट्स और बीजों के साथ तैयार करें स्वादिष्ट बाउल।

आज के दौर में जहां वज़न, ब्लड शुगर और पाचन से जुड़ी समस्याएं आम होती जा रही हैं, ओट्स जैसे सरल और पौष्टिक विकल्प का सेवन सेहत को बेहतर दिशा देने का सरल उपाय हो सकता है। हर सुबह ओट्स से दिन की शुरुआत करना न केवल हेल्दी आदत है, बल्कि ये शरीर को भीतर से मजबूत करने की दिशा में एक मजबूत कदम भी है।