US-NATO Warning : नई दिल्ली : अमेरिका और नाटो ने भारत, चीन और ब्राजील को रूस से सस्ते कच्चे तेल की खरीद पर गंभीर चेतावनी दी है। नाटो ने बुधवार को स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर इन देशों ने रूस से तेल आयात जारी रखा तो अमेरिका 100% सेकेंडरी सैंक्शंस लगा सकता है। अमेरिका का मानना है कि भारत और चीन द्वारा रूस से तेल मंगाने से मास्को को यूक्रेन युद्ध के लिए आर्थिक मदद मिलती है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि अगर भारत-चीन रूस से तेल मंगाना बंद कर दें तो रूस युद्ध का खर्च नहीं उठा पाएगा और मजबूरन जंग बंद करनी पड़ेगी।
भारत को अरबों डॉलर की बचत, लेकिन अब खतरा
भारत अपनी तेल जरूरत का करीब 85% आयात करता है, जिसमें से 35% से अधिक केवल रूस से आता है। यह तेल ब्रेंट क्रूड के मुकाबले औसतन 11% से 16% तक सस्ता होता है। इसी वजह से 2022 से 2025 के बीच भारत को करीब 11 से 25 अरब डॉलर की बचत हुई है। वित्त वर्ष 2023-24 में भारत को रूस से सस्ता तेल मंगाने पर करीब 7.9 अरब डॉलर यानी लगभग 65,000 करोड़ रुपये की बचत हुई थी। 2025 की शुरुआत में भारत ने रूस से अपने कुल आयातित तेल का लगभग 40% मंगाया। मई-जून 2025 में यह आंकड़ा 38-44% के बीच रहा।
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ब्रेंट क्रूड से 4-5 डॉलर सस्ता रूसी तेल
रूस भारत को ब्रेंट क्रूड से प्रति बैरल 4-5 डॉलर सस्ते दाम पर तेल बेचता है। 2022-2025 के बीच रूसी तेल की औसत कीमत 65-75 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि ब्रेंट क्रूड 80-85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहा। वहीं, सऊदी अरब और इराक जैसे देश ब्रेंट क्रूड के ही दाम पर तेल बेचते हैं। नतीजा यह होता है कि रूसी तेल 10-15% तक सस्ता पड़ता है।
अगर भारत यही तेल मध्य-पूर्व से मंगाता है तो प्रति बैरल 4-5 डॉलर का अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा। उदाहरण के लिए अगर भारत रोज़ाना 20 लाख बैरल तेल मंगाता है तो सालाना लगभग 2.9 अरब डॉलर की अतिरिक्त लागत आएगी।
लॉजिस्टिक्स और रणनीतिक चुनौतियां
मध्य-पूर्व से तेल लाने में भारत को लॉजिस्टिक और जियोपॉलिटिकल समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हाल ही में जब इज़राइल ने ईरान पर हमला किया था तो ईरान ने होरमूज जलडमरूमध्य बंद करने की धमकी दी थी, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ा था। वहीं रूस भारत को काले सागर और बाल्टिक समुद्री मार्गों के ज़रिए सस्ते और तेज़ सप्लाई विकल्प देता है, जिससे लॉजिस्टिक खर्च भी कम होता है।
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अमेरिका की नीति: दबाव बनाओ, विकल्प मत दो
अमेरिका और नाटो रूस से भारत की डीलिंग को सीधा यूक्रेन युद्ध से जोड़ते हैं, लेकिन वे भारत को सस्ते और वैकल्पिक तेल स्रोत नहीं देते। अगर भारत अमेरिकी दबाव में आकर रूस से तेल खरीद बंद करता है, तो उसकी ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और चालू खाता घाटा प्रभावित हो सकता है।













