Monday, September 21, 2026
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Unbridled social media : अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब गाली देना नहीं”: सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी, जल्द तय होंगे दिशा-निर्देश

#Nishanebaaz_News
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Unbridled social media : नई दिल्ली | सोशल मीडिया पर बेलगाम और विभाजनकारी टिप्पणियों के बढ़ते चलन पर सख्त रुख अपनाते हुए भारत के सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर नागरिक खुद को संयमित नहीं करते, तो राज्य को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में हो रही “अभद्रता और नफरत” पर अंकुश लगाने के लिए दिशा-निर्देश (Guidelines) तय करने पर विचार कर रहा है। यह टिप्पणी जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की दो सदस्यीय पीठ ने कोलकाता निवासी वज़ाहत खान की याचिका पर सुनवाई के दौरान की।

क्या है मामला?

कोलकाता के वज़ाहत खान ने एक याचिका दायर कर अपने खिलाफ देश के विभिन्न राज्यों में दर्ज FIRs को एकजुट करने (consolidate) की मांग की थी। उन्होंने पहले सोशल मीडिया पर एक महिला के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद महिला को हरियाणा से गिरफ्तार किया गया। हालांकि बाद में सामने आया कि वज़ाहत खान ने भी अपने सोशल मीडिया अकाउंट से विवादित और विभाजनकारी पोस्ट किए थे, जिसके चलते उनके खिलाफ असम, महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा में केस दर्ज हुए।

“अगर संयम नहीं बरता गया तो राज्य को आना ही पड़ेगा” – कोर्ट

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा,

“अगर लोग बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आनंद लेना चाहते हैं, तो उन्हें संविधान में निर्धारित ‘युक्तिसंगत प्रतिबंधों’ का पालन भी करना होगा। केवल अधिकार की बात नहीं चलेगी, कर्तव्य और आत्मनियंत्रण भी उतने ही जरूरी हैं।”

उन्होंने कहा कि “आज नागरिकों में आत्म-नियंत्रण की भारी कमी दिख रही है।”

“सोशल मीडिया पर बढ़ती नफरत, बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता के लिए खतरा”

कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया पर जिस तरह की भाषा और विचार सामने आ रहे हैं, वे देश की एकता, बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। कोर्ट का मानना है कि इस आज़ादी का इस्तेमाल “नफरत फैलाने या समुदायों को विभाजित करने” के लिए नहीं किया जा सकता।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा,

“हम सेंसरशिप की बात नहीं कर रहे हैं। लेकिन बंधुत्व, सेक्युलरिज़्म और गरिमा के सिद्धांतों की रक्षा के लिए सोशल मीडिया व्यवहार पर कुछ सीमा रेखाएं तय करना जरूरी है।”

“कोर्ट्स की भीड़, पुलिस पर बोझ – इसका समाधान चाहिए”

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया के दुरुपयोग के कारण बड़ी संख्या में मुकदमे अदालतों तक पहुंच रहे हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया बाधित हो रही है।

“जब आप सोशल मीडिया पर कुछ कहते हैं और वह बात कानून तक पहुंचती है, तो अदालत और पुलिस को समय देना पड़ता है। इससे दूसरे गंभीर मामलों की जांच बाधित होती है,” कोर्ट ने टिप्पणी की।

“एक राय रखना ठीक है, लेकिन उसे कहने का तरीका अहम”

जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि,

“एक राय रखना अलग बात है, लेकिन उसे अभद्र या नफरत फैलाने वाले अंदाज़ में कहना कानून की नजर में ‘हेट स्पीच’ बन जाता है। हम यह सब नागरिकों की नजर से देख रहे हैं, राज्य की नजर से नहीं।”

“बंधुत्व से कम होगी नफरत”: जस्टिस विश्वनाथन

पीठ के दूसरे सदस्य जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि,

“अगर नागरिकों के बीच बंधुत्व (Fraternity) की भावना मजबूत हो, तो समाज में नफरत स्वतः ही कम हो जाएगी।” उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर एडिटोरियल निगरानी की कमी के कारण लोग मनमानी करते हैं, जो गंभीर परिणामों को जन्म देता है।

 “समाज को भी जागरूक होना होगा” – वकील का तर्क

वज़ाहत खान की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ अग्रवाल ने कहा कि,

“हम वज़ाहत के बयानों को सही नहीं ठहरा रहे हैं, उन्होंने माफी भी मांगी है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि नफरत के ऐसे भाषणों को ‘ऑक्सीजन’ समाज की प्रतिक्रिया से मिलती है। अगर शुरुआत में ही इनका सामाजिक बहिष्कार किया जाए, तो यह रुकेगा।”

सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि वह इस पूरे मुद्दे पर सोशल मीडिया उपयोग के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश (social conduct guidelines) बनाने की संभावना पर विचार कर रहा है। कोर्ट ने सभी पक्षों से सहयोग की अपील की है और चार हफ्तों बाद अगली सुनवाई तय की है। गौरतलब है कि कुछ दिन पहले YouTuber रणवीर अल्लाहबादिया के केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया कंटेंट को लेकर दिशा-निर्देश तय करने की जरूरत पर ज़ोर दिया था।

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