Sunday, August 16, 2026
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केशवानंद भारती केस मात्र कानूनी मिसाल नहीं, संविधानवाद के प्रति भारत की गहरी प्रतिबद्धता है : सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत

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नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि केशवानंद भारती मामला महज एक कानूनी मिसाल नहीं था, बल्कि यह संविधानवाद और कानून के शासन के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की सबसे गहरी पुष्टिओं में से एक था। सीजेआई ने इस ऐतिहासिक फैसले के महत्व पर जोर दिया, जिसने देश के संवैधानिक इतिहास को आकार दिया।

संविधान के मूल ढांचे का सिद्धांत
1973 का ऐतिहासिक केशवानंद भारती फैसला वह आधार था जिसने संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) के सिद्धांत को निर्धारित किया। इस सिद्धांत ने संविधान में संशोधन करने की संसद की व्यापक शक्ति को सीमित कर दिया। इस फैसले ने न्यायपालिका को यह अधिकार दिया कि वह संसद द्वारा किए गए किसी भी संशोधन की संवैधानिक समीक्षा कर सकती है, यदि वह संशोधन संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन करता है।

68 दिन चली थी ऐतिहासिक सुनवाई
यह मुकदमा केरल सरकार द्वारा भूमि सुधार कानून-1969 के तहत कासरगोड स्थित एडनीर मठ पर कब्जा करने की कोशिश के खिलाफ लड़ा गया था। मठ के शंकराचार्य केशवानंद श्रीपदगलवरु ने फरवरी 1970 में मुकदमा दायर कर सरकार के कदम को अपने धर्म, संपत्ति और अन्य मूल अधिकारों का उल्लंघन करार दिया था।

सुनवाई अवधि: मुकदमे की सुनवाई 31 अक्तूबर, 1972 को शुरू हुई और 23 मार्च, 1973 तक चली, यानी कुल पांच महीने और 68 दिन।

वकील: याची की ओर से नानीभाई पालकीवाला के नेतृत्व में फली एस नरीमन और सोली सोराबजी जैसे दिग्गज वकीलों ने मुकदमा लड़ा था।

संसद और न्यायपालिका के बीच संघर्ष की पृष्ठभूमि
यह मुकदमा दो दशक से संसद और न्यायपालिका के बीच जारी संघर्ष की पृष्ठभूमि में लड़ा गया था। सुप्रीम कोर्ट फरवरी 1967 में गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार मुकदमे में पहले ही साफ कर चुकी थी कि संसद नागरिकों के मूल अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती। इसके जवाब में संसद ने एक संशोधन किया जिसके तहत वह संविधान के किसी भी हिस्से में बदलाव कर सकती थी और न्यायपालिका को पुनर्विचार से रोका गया था। उस समय केंद्र सरकार संपत्ति के अधिकार को सीमित करने के लिए भूमि सुधार कर रही थी, जो केशवानंद भारती मुकदमे का मुख्य विषय था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि मूल अधिकार संविधान संशोधन के तहत खत्म नहीं किए जा सकते। 13 जजों की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि संसद संविधान के हर प्रावधान को संशोधित कर सकती है, पर इसकी बुनियाद और भावना को क्षति या तबाह नहीं कर सकती।

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