Ramavatar Jaggi Murder Case : ‘जग्गी हत्याकांड’ का जिन्न 21 साल बाद फिर बाहर; क्या अमित जोगी के ‘अभय कवच’ में लगेगी सेंध? 1 अप्रैल को हाईकोर्ट में ‘अग्निपरीक्षा’

VIKASH KHALKHO

Ramavatar Jaggi Murder Case : गौरी शंकर गुप्ता/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति के इतिहास का सबसे सनसनीखेज और हाई-प्रोफाइल ‘रामावतार जग्गी हत्याकांड’ एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद बिलासपुर हाईकोर्ट ने इस मामले को ‘री-ओपन’ कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने 1 अप्रैल को इस मामले की ‘फाइनल हियरिंग’ (अंतिम सुनवाई) तय की है। इस फैसले ने न केवल जोगी परिवार बल्कि समूचे प्रदेश के सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।

कानूनी जंग का नया पड़ाव: दांव पर है अमित जोगी की ‘दोषमुक्ति’

2007 में रायपुर की निचली अदालत ने इस हत्याकांड में 28 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, लेकिन पर्याप्त सबूतों के अभाव में अमित जोगी को बरी (Acquittal) कर दिया गया था। मृतक रामावतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने इस फैसले को चुनौती दी थी। अब हाईकोर्ट मेरिट के आधार पर यह तय करेगा कि क्या अमित जोगी की दोषमुक्ति बरकरार रहेगी या उनकी मुश्किलें बढ़ेंगी।

फ्लैशबैक: 4 जून 2003 की वो खूनी रात

रायपुर की सड़कों पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के कद्दावर नेता और विद्याचरण शुक्ल के बेहद करीबी माने जाने वाले रामावतार जग्गी की सरेराह गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

  • सियासी वर्चस्व: उस समय राज्य में अजीत जोगी की सरकार थी और विद्याचरण शुक्ल ने कांग्रेस से अलग होकर NCP का दामन थाम लिया था। जग्गी को NCP का प्रदेश कोषाध्यक्ष बनाया गया था।

  • साजिश का आरोप: जानकारों का मानना है कि जग्गी की बढ़ती सक्रियता और NCP का बढ़ता ग्राफ तत्कालीन सत्ता के लिए चुनौती बन रहा था, जिसे कुचलने के लिए यह ‘सुनियोजित हत्या’ की गई।

केस की अब तक की स्थिति: एक नजर में

विवरण तथ्य
कुल आरोपी 31 अभियुक्त बनाए गए थे
सरकारी गवाह बुलठू पाठक और सुरेंद्र सिंह (इन्होंने साजिश की परतें खोलीं)
2007 का फैसला 28 को उम्रकैद, अमित जोगी सबूतों के अभाव में बरी
मुख्य दोषी अभय गोयल, याहया ढेबर, वीके पांडे, फिरोज सिद्दीकी, सूर्यकांत तिवारी आदि

 

सतीश जग्गी का तर्क: “स्टेट स्पॉन्सर्ड मर्डर”

सतीश जग्गी के वकीलों का पक्ष बेहद कड़ा है। उनका कहना है कि यह हत्याकांड तत्कालीन सरकार द्वारा प्रायोजित था। जब पूरी प्रशासनिक मशीनरी ही साक्ष्यों को प्रभावित करने में जुट जाए, तो सीधा सबूत मिलना कठिन होता है, लेकिन ‘परिस्थितिजन्य साक्ष्य’ और ‘साजिश’ (Conspiracy) के आधार पर न्याय होना चाहिए।

अमित जोगी का पक्ष: “न्यायपालिका पर भरोसा”

दूसरी ओर, अमित जोगी ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी सफाई में कहा है कि वे पूरी तरह निर्दोष हैं। उन्होंने इस कानूनी प्रक्रिया को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ करार दिया है और न्यायपालिका के प्रति अपना विश्वास जताया है।

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विकास कुमार खलखो एक डिजिटल पत्रकार, समाचार संपादक और SEO कंटेंट क्रिएटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में एक दशक से अधिक का अनुभव है। उन्होंने BJMC, Master of Journalism (MJ) और M.Phil. (मीडिया स्टडीज़) की डिग्री हासिल की है और दबंग दुनिया, हमर छत्तीसगढ़ योजना, हरिभूमि, सन स्टार डेली न्यूज़ और छत्तीसगढ़ की आवाज़ जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है। उन्हें हिंदी पत्रकारिता, ब्रेकिंग न्यूज़ कवरेज, SEO-फ्रेंडली कंटेंट राइटिंग, डिजिटल पब्लिशिंग, कंटेंट स्ट्रैटेजी, थंबनेल डिज़ाइन और सोशल मीडिया मैनेजमेंट में विशेष महारत हासिल है। उनका उद्देश्य सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों तक प्रभावशाली समाचार पहुँचाना और साथ ही उच्च गुणवत्ता वाला डिजिटल कंटेंट तैयार करना है।
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