Ramavatar Jaggi Murder Case : गौरी शंकर गुप्ता/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति के इतिहास का सबसे सनसनीखेज और हाई-प्रोफाइल ‘रामावतार जग्गी हत्याकांड’ एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद बिलासपुर हाईकोर्ट ने इस मामले को ‘री-ओपन’ कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने 1 अप्रैल को इस मामले की ‘फाइनल हियरिंग’ (अंतिम सुनवाई) तय की है। इस फैसले ने न केवल जोगी परिवार बल्कि समूचे प्रदेश के सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
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प्रिय मित्रों और शुभचिंतकों,अभी जानकारी मिली है कि माननीय हाईकोर्ट 1 अप्रैल को उस मामले में सुनवाई करेगा, जिसमें मुझे दो दशक पहले ही बरी किया जा चुका है।
मैं पूरी शांति और आत्मविश्वास के साथ यह कहना चाहता हूँ कि ईश्वर की कृपा अब तक मेरे साथ रही है, और आगे भी रहेगी। मुझे…
— 𝐀𝐦𝐢𝐭 𝐀𝐣𝐢𝐭 𝐉𝐨𝐠𝐢 (@AmitJogi) March 25, 2026
कानूनी जंग का नया पड़ाव: दांव पर है अमित जोगी की ‘दोषमुक्ति’
2007 में रायपुर की निचली अदालत ने इस हत्याकांड में 28 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, लेकिन पर्याप्त सबूतों के अभाव में अमित जोगी को बरी (Acquittal) कर दिया गया था। मृतक रामावतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने इस फैसले को चुनौती दी थी। अब हाईकोर्ट मेरिट के आधार पर यह तय करेगा कि क्या अमित जोगी की दोषमुक्ति बरकरार रहेगी या उनकी मुश्किलें बढ़ेंगी।
फ्लैशबैक: 4 जून 2003 की वो खूनी रात
रायपुर की सड़कों पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के कद्दावर नेता और विद्याचरण शुक्ल के बेहद करीबी माने जाने वाले रामावतार जग्गी की सरेराह गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
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सियासी वर्चस्व: उस समय राज्य में अजीत जोगी की सरकार थी और विद्याचरण शुक्ल ने कांग्रेस से अलग होकर NCP का दामन थाम लिया था। जग्गी को NCP का प्रदेश कोषाध्यक्ष बनाया गया था।
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साजिश का आरोप: जानकारों का मानना है कि जग्गी की बढ़ती सक्रियता और NCP का बढ़ता ग्राफ तत्कालीन सत्ता के लिए चुनौती बन रहा था, जिसे कुचलने के लिए यह ‘सुनियोजित हत्या’ की गई।
केस की अब तक की स्थिति: एक नजर में
| विवरण | तथ्य |
| कुल आरोपी | 31 अभियुक्त बनाए गए थे |
| सरकारी गवाह | बुलठू पाठक और सुरेंद्र सिंह (इन्होंने साजिश की परतें खोलीं) |
| 2007 का फैसला | 28 को उम्रकैद, अमित जोगी सबूतों के अभाव में बरी |
| मुख्य दोषी | अभय गोयल, याहया ढेबर, वीके पांडे, फिरोज सिद्दीकी, सूर्यकांत तिवारी आदि |
सतीश जग्गी का तर्क: “स्टेट स्पॉन्सर्ड मर्डर”
सतीश जग्गी के वकीलों का पक्ष बेहद कड़ा है। उनका कहना है कि यह हत्याकांड तत्कालीन सरकार द्वारा प्रायोजित था। जब पूरी प्रशासनिक मशीनरी ही साक्ष्यों को प्रभावित करने में जुट जाए, तो सीधा सबूत मिलना कठिन होता है, लेकिन ‘परिस्थितिजन्य साक्ष्य’ और ‘साजिश’ (Conspiracy) के आधार पर न्याय होना चाहिए।
अमित जोगी का पक्ष: “न्यायपालिका पर भरोसा”
दूसरी ओर, अमित जोगी ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी सफाई में कहा है कि वे पूरी तरह निर्दोष हैं। उन्होंने इस कानूनी प्रक्रिया को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ करार दिया है और न्यायपालिका के प्रति अपना विश्वास जताया है।











