CG Alderman List: रायपुर। छत्तीसगढ़ के नगरीय निकायों में एल्डरमैन (मनोनीत पार्षद) की नियुक्ति को लेकर प्रदेश का सियासी पारा अचानक गरमा गया है. राज्य में करीब दो साल पहले नगरीय निकाय चुनाव संपन्न होने के बावजूद एल्डरमैनों की नियुक्तियां लंबे समय से लंबित थीं. कड़े इंतजार और लंबे प्रशासनिक फेरबदल के बाद राज्य शासन ने आखिरकार कुछ नगर निगमों के लिए एल्डरमैनों की आधिकारिक सूची जारी कर दी है, लेकिन सूची के सार्वजनिक होते ही सत्ताधारी दल के भीतर और बाहर गंभीर सियासी विवाद और असंतोष की स्थिति निर्मित हो गई है.
वित्त विभाग की आपत्तियों के बाद क्लीयर हुई थी फाइल
सूत्रों के मुताबिक, एल्डरमैनों की नियुक्ति से जुड़ी यह महत्वपूर्ण फाइल लंबे समय तक शासन और मंत्रालय स्तर पर दबी रही. बताया जाता है कि शुरुआत में वित्त विभाग ने इन मनोनीत पार्षदों पर होने वाले प्रशासनिक खर्च, वित्तीय भार और इनकी जमीनी उपयोगिता को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे, जिसके कारण फाइल आगे नहीं बढ़ पा रही थी. बाद में भाजपा संगठन के शीर्ष नेतृत्व ने इस विषय पर अपनी दखलंदाजी की और शासन को अपनी अंतिम राय भेजी. हाल के दिनों में उच्च स्तर पर हुई मैराथन राजनीतिक चर्चाओं के बाद आखिरकार इस बहुप्रतीक्षित सूची को अंतिम रूप देकर जारी किया गया.
रायपुर में विनय ओझा के नाम पर बढ़ा विवाद: कार्यकर्ताओं ने कहा- ‘निष्ठावान आज भी दरी उठा रहे हैं’
सूची के आधिकारिक तौर पर सामने आते ही सबसे अधिक राजनीतिक बवाल और तीखी चर्चा रायपुर नगर निगम को लेकर शुरू हो गई है. सोशल मीडिया पर रायपुर की सूची में दूसरे क्रम पर दर्ज ‘विनय ओझा’ के नाम को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं और तरह-तरह की टिप्पणियां की जा रही हैं. स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं का खुला आरोप है कि रायपुर के पूर्व कांग्रेसी महापौर एजाज ढेबर के बेहद करीबी रहे व्यक्ति को पार्टी ने एल्डरमैन जैसी महत्वपूर्ण कुर्सी सौंप दी है.
हालांकि, इसके विपरीत पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं और समर्थकों का तर्क है कि विनय ओझा मूल रूप से लंबे समय तक भाजपा से ही जुड़े रहे हैं और उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ जमीनी काम किया था. वे बीच में कुछ समय के लिए कांग्रेस में चले गए थे, लेकिन पिछले चुनाव के दौरान उन्होंने दोबारा भाजपा का दामन थाम लिया था.
इस दलील के बावजूद पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश देखा जा रहा है. कार्यकर्ताओं का कहना है कि जो निष्ठावान कार्यकर्ता वर्षों से बिना किसी स्वार्थ के संगठन के लिए रात-दिन मेहनत कर रहे हैं, दरी उठा रहे हैं, उन्हें दरकिनार कर दिया गया और बार-बार दल बदलने वाले अवसरवादी चेहरों को प्राथमिकता दे दी गई. इसके साथ ही सूची में कुछ ठेकेदारों और पूर्व पार्षदों को दोबारा शामिल किए जाने को लेकर भी नए कार्यकर्ताओं की अनदेखी के सवाल उठ रहे हैं.
बिलासपुर में खींचतान चरम पर, पार्षदों और विधायकों के बीच नहीं बनी बात
रायपुर में मचे इस घमासान के बीच बिलासपुर नगर निगम के एल्डरमैनों की सूची अब तक सहमति के अभाव में पूरी तरह अटकी हुई है. सूत्रों के अनुसार, बिलासपुर के लिए प्रस्तावित नामों को लेकर संगठन स्तर पर लगातार कई दौर का मंथन किया गया, लेकिन स्थानीय गुटबाजी और खींचतान के चलते अंतिम आम सहमति नहीं बन सकी है.
बताया जा रहा है कि बिलासपुर की महापौर पूजा विधानी और उनके पति अशोक विधानी की ओर से कुछ चुनिंदा नामों को सूची में शामिल करने का पुरजोर प्रस्ताव रखा गया है. दूसरी ओर, भाजपा संगठन और स्थानीय विधायकों के समर्थक भी अपने-अपने चहेते नेताओं को एल्डरमैन बनवाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं. कड़े गतिरोध के कारण प्रदेश संगठन के वरिष्ठ नेताओं के हस्तक्षेप और समझाइश के बाद भी अब तक बिलासपुर का कोई सर्वमान्य समाधान नहीं निकल सका है. नगर निगम के भाजपा पार्षद दल के भीतर चल रहे अंतर्विरोधों का सीधा असर इस सूची के लटकने के रूप में दिखाई दे रहा है.
रायपुर के घटनाक्रम के बाद अब पूरे प्रदेश की राजनीतिक नजरें बिलासपुर की आने वाली सूची पर टिक गई हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रायपुर का यह विवाद यह साफ संकेत दे रहा है कि एल्डरमैन की नियुक्तियां अब महज एक वैधानिक प्रक्रिया नहीं रह गई हैं, बल्कि यह आगामी चुनावों से ठीक पहले संगठन के भीतर आंतरिक गुटों और कार्यकर्ताओं के बीच संतुलन साधने की एक बड़ी राजनीतिक अग्निपरीक्षा बन चुकी है.







