Thursday, October 8, 2026
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नाना पाटेकर के ये 10 किरदार बने मिसाल, कभी विलेन तो कभी हीरो बनकर जीता दिल

Nana Patekar Iconic Films: निशानेबाज न्यूज़ डेस्क- अगर नाना पाटेकर के निधन की खबर की पुष्टि होती है, तो यह भारतीय सिनेमा के लिए बेहद दुखद क्षति होगी। अपने लंबे फिल्मी करियर में नाना पाटेकर ने ऐसे किरदार निभाए, जो सिर्फ पर्दे तक सीमित नहीं रहे, बल्कि दर्शकों के बीच लंबे समय तक याद किए गए। कभी खतरनाक विलेन, कभी जुझारू पुलिस अधिकारी तो कभी बेहद भावुक पिता के किरदार में उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी।

नाना पाटेकर की खासियत यह रही कि वह हर किरदार को अपनी आवाज, संवाद अदायगी और भावनात्मक अभिनय से अलग पहचान देते थे। उनके कई संवाद आज भी दर्शकों को याद हैं। आइए जानते हैं उनके करियर की उन फिल्मों के बारे में, जिन्होंने उन्हें हिंदी और मराठी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में शामिल किया।

1. परिंदा (1989): खतरनाक अन्ना से मिली बड़ी पहचान
विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘परिंदा’ में नाना पाटेकर ने अंडरवर्ल्ड डॉन अन्ना सेठ का किरदार निभाया था। उनका खौफनाक और प्रभावशाली अभिनय फिल्म की सबसे बड़ी खासियतों में शामिल रहा। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला।

2. तिरंगा (1993): देशभक्ति के रंग में दमदार अंदाज
राजकुमार और नाना पाटेकर की जोड़ी वाली ‘तिरंगा’ दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुई। फिल्म में देशभक्ति और अपराध के खिलाफ लड़ाई को दिखाया गया था। नाना का दमदार अंदाज और संवाद आज भी इस फिल्म को यादगार बनाते हैं।

3. क्रांतिवीर (1994): प्रताप नारायण तिलक का किरदार
‘क्रांतिवीर’ नाना पाटेकर के करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक है। इसमें उन्होंने प्रताप नारायण तिलक की भूमिका निभाई। उनके आक्रामक अभिनय और दमदार संवादों ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था।

4. अग्निसाक्षी (1996): निगेटिव किरदार में दिखा अलग रूप
‘अग्निसाक्षी’ में नाना पाटेकर ने एक जुनूनी और हिंसक पति का किरदार निभाया था। यह भूमिका उनके पहले के किरदारों से काफी अलग थी। फिल्म में उनके अभिनय ने यह दिखाया कि वह नायक के अलावा जटिल और नकारात्मक किरदारों को भी उतनी ही मजबूती से निभा सकते हैं।

5. खामोशी: द म्यूजिकल (1996): भावनाओं से भर दिया पर्दा
संजय लीला भंसाली की ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ में नाना पाटेकर ने एक गूंगे-बहरे पिता का किरदार निभाया। फिल्म में उनके अभिनय में संवादों से ज्यादा भावनाओं की भूमिका थी। उनकी आंखों और हाव-भाव ने किरदार को बेहद प्रभावशाली बनाया।

6. अब तक छप्पन (2004): शांत लेकिन खतरनाक पुलिस अफसर
‘अब तक छप्पन’ में नाना पाटेकर ने एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिस अधिकारी साधु आगाशे की भूमिका निभाई। उनका शांत, सख्त और नियंत्रित अंदाज दर्शकों को काफी पसंद आया। यह फिल्म उनके गंभीर और यथार्थवादी अभिनय के लिए याद की जाती है।

7. अपहरण (2005): राजनीति और अपराध के बीच ग्रे किरदार
प्रकाश झा की राजनीतिक थ्रिलर ‘अपहरण’ में नाना पाटेकर ने एक प्रभावशाली ग्रे-शेड किरदार निभाया। फिल्म में उनके अभिनय को काफी सराहना मिली और यह भूमिका भी उनके अलग-अलग रंग दिखाने वाले किरदारों में शामिल रही।

8. वेलकम और वेलकम बैक: कॉमेडी में भी जमाया रंग
नाना पाटेकर को सिर्फ गंभीर भूमिकाओं के लिए याद करना उनके अभिनय की पूरी तस्वीर नहीं है। ‘वेलकम’ और ‘वेलकम बैक’ में उदय शेट्टी के किरदार में उन्होंने जबरदस्त कॉमेडी की। उनके गुस्सैल अंदाज, संवाद और अनिल कपूर के मजनू भाई के साथ उनकी जोड़ी ने दर्शकों को खूब हंसाया।

9. राजनीति (2010): सत्ता के खेल में दमदार भूमिका
प्रकाश झा की ‘राजनीति’ में नाना पाटेकर ने बृज गोपाल का किरदार निभाया। महाभारत से प्रेरित राजनीतिक कहानी में उनका किरदार रणनीति, राजनीति और सत्ता के खेल के बीच अहम भूमिका निभाता है। फिल्म में उनका अभिनय काफी प्रभावशाली रहा।

10. नटसम्राट (2016): अभिनय का सबसे भावुक दौर
मराठी फिल्म ‘नटसम्राट’ नाना पाटेकर के करियर की सबसे यादगार फिल्मों में गिनी जाती है। इसमें उन्होंने रंगमंच के दिग्गज कलाकार गणपत बेलवलकर की भूमिका निभाई। उम्र, परिवार, सम्मान और अकेलेपन से जूझते इस किरदार में नाना ने बेहद भावुक अभिनय किया।

नाना पाटेकर के करियर की खास बात
नाना पाटेकर की फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत उनके किरदारों की विविधता रही। उन्होंने एक तरफ ‘परिंदा’ और ‘अब तक छप्पन’ जैसे गंभीर किरदार निभाए, तो दूसरी तरफ ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में हास्य से दर्शकों का मनोरंजन किया। ‘खामोशी’ और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों में उन्होंने भावनात्मक अभिनय की गहराई भी दिखाई।यही वजह है कि नाना पाटेकर की फिल्मों को याद करते समय सिर्फ उनकी लोकप्रियता नहीं, बल्कि उनके अभिनय की अलग शैली भी सामने आती है। उनके किरदारों में आम आदमी की परेशानियां, गुस्सा, संघर्ष, भावनाएं और सामाजिक परिस्थितियां दिखाई देती रही हैं।

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