लेह/नई दिल्ली : लद्दाख के सियाचिन ग्लेशियर में हिमस्खलन की वजह से भारतीय सेना के तीन जवान शहीद हो गए हैं। इनमें दो अग्निवीर शामिल हैं। हिमस्खलन ने एक पोस्ट को पूरी तरह चपेट में ले लिया। तीनों जवान उस समय पेट्रोलिंग पर थे। घटना के तुरंत बाद सेना की बचाव टीमें सक्रिय हो गईं।
शहीद जवानों के नाम हैं सिपाही मोहित कुमार, अग्निवीर नीरज कुमार चौधरी और अग्निवीर डाभी राकेश देवभाई। ये सभी महार रेजीमेंट से थे और क्रमशः गुजरात, उत्तर प्रदेश और झारखंड के रहने वाले थे। पांच अन्य जवान हिमस्खलन में फंसे हुए हैं, जबकि एक कैप्टन को बचा लिया गया है।
सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र है, जहां सैनिक -60 डिग्री की ठंड, तेज हवाओं और बर्फीले खतरों का सामना करते हैं। सियाचिन में ऐसी घटनाएं सामान्य हैं। 1984 के ऑपरेशन मेघदूत के बाद अब तक 1,000 से अधिक सैनिक मौसम की वजह से शहीद हो चुके हैं।
बचाव कार्य
हिमस्खलन की खबर मिलते ही भारतीय सेना और वायुसेना ने तुरंत बचाव कार्य शुरू कर दिया। विशेषज्ञ अवलांच रेस्क्यू टीमें (ART) मौके पर पहुंचीं और लेह व उधमपुर से मदद ले रही हैं। सेना के हेलिकॉप्टर जैसे चीता और Mi-17 घायलों को निकालने और अस्पताल पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
पिछली घटनाओं से सीखते हुए, सियाचिन में बुनियादी ढांचा मजबूत किया गया है। DRDO के ऑल-टेरेन व्हीकल (ATV) ब्रिज, डायनीमा रस्सियां और हेवी-लिफ्ट हेलिकॉप्टर जैसे चिनूक बचाव को आसान बनाते हैं। ISRO के टेलीमेडिसिन नोड्स और HAPO चैंबर्स ने चिकित्सा सुविधाएं बढ़ाई हैं।
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सियाचिन का रणनीतिक महत्व
सियाचिन ग्लेशियर 76 किलोमीटर लंबा है और कराकोरम रेंज में स्थित है। यह भारत और पाकिस्तान के बीच विवादित क्षेत्र है। 1984 में भारत ने ऑपरेशन मेघदूत के माध्यम से इस पर कब्जा किया। यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह शक्सगाम घाटी (चीन को पाकिस्तान ने दी) और गिलगित-बाल्टिस्तान (पाकिस्तान के कब्जे में) के बीच दीवार की तरह स्थित है।
हालांकि, सियाचिन में सैनिकों का सबसे बड़ा दुश्मन मौसम है। 1984 से अब तक 870 से अधिक जवान मौसम, हिमस्खलन और अन्य कारणों से शहीद हो चुके हैं, जबकि युद्ध में नुकसान अपेक्षाकृत कम रहा है।









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