High Court order : सिरमौर : सिरमौर ब्लॉक की डोल प्राथमिक पाठशाला में अतिथि विद्वानों (शिक्षकों) की नियुक्ति का मामला जिला शिक्षा विभाग के कारनामों को उजागर करता है, जहां एक प्रभारी प्रधानाध्यापक की हठ के सामने उच्च न्यायालय का आदेश भी बौना साबित हो गया। पिछले शैक्षणिक सत्र में कार्यरत एक अतिथि विद्वान ने अपनी नियुक्ति को लेकर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। न्यायालय ने सुनवाई के बाद जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को नियमानुसार नियुक्ति करने का स्पष्ट आदेश दिया था। इसके बावजूद, कथित तौर पर प्रभारी प्रधानाध्यापक ने आदेश का पालन नहीं किया, और हैरानी की बात यह है कि संकुल प्राचार्य से लेकर जिला शिक्षा अधिकारी तक के आला अधिकारियों ने इस अनुशासनहीनता पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।
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High Court order : न्यायालय के आदेश के बाद भी, जिला शिक्षा विभाग की टेबलों पर महीनों तक सिर्फ पत्राचार का खेल चलता रहा। फाइलें एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर घूमती रहीं, लेकिन उच्च न्यायालय के आदेश का परिपालन सुनिश्चित नहीं किया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि या तो इस प्रभारी प्रधानाध्यापक के पास राजनैतिक रसूख है, जिसके कारण बड़े अधिकारी कार्यवाही करने से कतरा रहे हैं, या फिर यह सरकारी सिस्टम की घोर लाचारी है। शैक्षणिक सत्र के अंतिम चरण में भी, उच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना करने वाले डोल स्कूल के प्रभारी प्रधानाध्यापक को बचाने का प्रयास जारी रहा, जिससे पूरे शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
High Court order : यह पूरा विवाद तब प्रकाश में आया जब डोल प्राथमिक विद्यालय में नियुक्त हुए दो अतिथि शिक्षकों के बीच घमासान शुरू हो गया। शिकायतकर्ता अतिथि विद्वान ने दावा किया कि उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) ने आदेश का पालन नहीं किया, जिससे उनकी नियुक्ति खतरे में पड़ गई। इस मामले में बाइट देने वाले लोगों में डोल प्राथमिक पाठशाला के प्रभारी प्रधानाध्यापक सुरेंद्र सिंह और हायर सेकेंडरी स्कूल पडरी, सिरमौर के संकुल प्रभारी दयाशंकर द्विवेदी शामिल हैं, जिनके बयान शिक्षा विभाग के भीतर चल रही खींचतान को और भी स्पष्ट कर सकते हैं।
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High Court order : अब सभी की निगाहें संयुक्त संचालक (JD) कार्यालय पर टिकी हैं, जहां इस पूरे मामले का जांच प्रतिवेदन भेजा गया है। देखना दिलचस्प होगा कि JD कार्यालय की जांच के बाद, उच्च न्यायालय के आदेश का पालन न करने वाले अधिकारियों—चाहे वह स्कूल के प्रभारी प्रधानाध्यापक हों या जिला शिक्षा अधिकारी—में से किसे ‘बली का बकरा’ बनाया जाता है। यह मामला न केवल न्यायपालिका के आदेश की गरिमा से जुड़ा है, बल्कि शिक्षा विभाग में व्याप्त लाल फीताशाही और अनुशासनहीनता की संस्कृति पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।











